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जैसलमेर शहर में तेज होती हीटवेव अब निर्माण उद्योग के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। तापमान 40-45 डिग्री सेल्सियस के आस-पास रहने के साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर और बिल्डिंग प्रोजेक्ट्स की रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई है। दोपहर के समय निर्माण स्थलों पर काम लगभग पूरी तरह रोकना पड़ रहा है, जिससे प्रोजेक्ट डिलीवरी शेड्यूल लगातार खिसक रहे हैं।
सुबह 6 से 11 बजे और शाम 5 बजे के बाद ही काम संभव हो पा रहा है। यानी दिन के करीब 4 से 5 घंटे पूरी तरह 'डेड जोन' में बदल चुके हैं। इस वजह से दैनिक कार्य प्रगति में औसतन 30 से 40 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज हो रही है। मजदूरों पर गर्मी का सीधा असर दिख रहा है। लगातार लू और हाई टेम्परेचर के कारण कार्य क्षमता घट रही है, वहीं कई श्रमिक अस्थायी रूप से अपने गांव लौट गए हैं। इससे मैनपावर गैप और बढ़ गया है, जिसका सीधा असर निर्माण की गति पर पड़ रहा है। गर्मी केवल श्रमिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्माण गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। कंक्रीट डालने के दौरान तेज तापमान के कारण पानी तेजी से सूख रहा है, जिससे स्ट्रक्चरल मजबूती पर असर का खतरा बढ़ रहा है। मशीनरी का ओवरहीट होना भी एक बड़ी समस्या बन रहा है, जिससे बार-बार तकनीकी रुकावटें आ रही हैं।
-तापमान 40 डिग्री से अधिक, दोपहर में काम लगभग शून्य
-4–5 घंटे का 'नो-वर्क विंडो' रोज बन रहा
प्रोजेक्ट प्रगति में 30–40 प्रतिशत तक गिरावट
-श्रमिकों की उपस्थिति में 20–25 प्रतिशत तक कमी
-कंक्रीट सेटिंग टाइम और क्वालिटी प्रभावित
एक्सपर्ट व्यू : हीटवेव कंडीशन निर्माण के लिए क्रिटिकल जोन
सिविल इंजीनियरिंग कंसल्टेंट राहुल सक्सेना के अनुसार 40 डिग्री सेल्सियस के ऊपर तापमान निर्माण कार्य के लिए क्रिटिकल जोन माना जाता है। जैसलमेर में मौजूदा हीटवेव कंडीशन में श्रमिकों की उत्पादकता 30 प्रतिशत से अधिक घट जाती है। लगातार गर्मी के कारण शरीर में डिहाइड्रेशन और थकान बढ़ती है, जिससे कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं। कंक्रीट वर्क में हाई टेम्परेचर के कारण रैपिड एवापोरेशन होता है, जिससे माइक्रो-क्रैक्स बनने का खतरा बढ़ता है। यदि समय रहते शिफ्ट प्लानिंग, कूलिंग सिस्टम और हाइड्रेशन मैनेजमेंट नहीं अपनाए गए तो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत वृद्धि तय है।
Published on:
05 May 2026 08:55 pm
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