
जैसलमेर. न काल्पनिक केस, एक जैसा डिजिटल पैटर्न
केस 1 : जैसलमेर निवासी रमेश ( परिवर्तित नाम ) को संदेश मिला कि विशेष श्राद्ध पूजा में उनके पूर्वजों के नाम से अनुष्ठान होगा और पूजा का वीडियो भेजा जाएगा। संदेश में भुगतान लिंक था। रमेश ने लिंक पर भुगतान करने के बजाय संस्था की आधिकारिक जानकारी तलाश की। पुष्टि नहीं होने पर उसने भुगतान रोक दिया।
केस 2 : सुनीता ( परिवर्तित नाम ) को संदेश मिला कि श्राद्ध पूजा के बाद उनके परिवार के नाम का प्रसाद घर भेजा जाएगा। प्रसाद भेजने के लिए ऑनलाइन शुल्क जमा करने को कहा गया और क्यूआर कोड भेजा गया। सुनीता ने संदेश में दिए नंबर के बजाय संस्था के आधिकारिक संपर्क माध्यम से जानकारी ली। सेवा की पुष्टि नहीं हुई, इसलिए भुगतान नहीं किया।
केस 3 : मोहन सिंह ( परिवर्तित नाम ) को विशेष अनुष्ठान में नाम शामिल करने के लिए तत्काल दान का संदेश मिला। पूर्वजों की शांति और धार्मिक पुण्य से जुड़ी भावनात्मक भाषा के साथ क्यूआर कोड और बैंक खाते की जानकारी दी गई। मोहन ने संस्था, रसीद और सेवा की पुष्टि मांगी। स्पष्ट जानकारी नहीं मिलने पर राशि जमा नहीं की।
जैसलमेर.श्राद्ध पक्ष में मोबाइल पर आने वाला धार्मिक संदेश अब केवल आस्था से जुड़ी सूचना नहीं रह गया है। साइबर ठगी करने वाले लोग इसी भावनात्मक जुड़ाव को डिजिटल भुगतान तक पहुंचने के रास्ते के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। संदेश में पूर्वजों की शांति, विशेष पूजा, प्रसाद, अनुष्ठान या पूजा का वीडियो भेजने जैसे दावे किए जाते हैं। इसके बाद लिंक, क्यूआर कोड, यूपीआइ या बैंक खाते के जरिए भुगतान का आग्रह सामने आता है। यानी ठगी का तरीका पहले जैसा सीधे पैसा मांगने वाला नहीं, बल्कि पहले भरोसा, फिर धार्मिक सेवा और अंत में भुगतान वाला हो सकता है। यही बदलाव इसे अधिक जोखिमपूर्ण बनाता है।
पूर्वजों की शांति के नाम पर तत्काल निर्णय का दबाव।
पूजा या प्रसाद के बदले पहले ऑनलाइन भुगतान।
संदेश में दिया गया अनजान लिंक या क्यूआर कोड।
निजी बैंक खाते में दान जमा करने की अपील।
भुगतान के बाद रसीद या सेवा मिलने का अस्पष्ट भरोसा।
संस्था का पता, पंजीकरण या आधिकारिक संपर्क स्पष्ट नहीं होना।
संदेश में दिए नंबर के अलावा कोई स्वतंत्र संपर्क माध्यम नहीं होना।
डिजिटल ठगी में भरोसा पैदा करना पहला चरण हो सकता है। धार्मिक संदेशों में भावनात्मक विषय जोड़कर व्यक्ति को जल्द निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। इसलिए किसी संस्था का नाम, धार्मिक भाषा, फोटो या पूजा का दावा उसकी वास्तविकता का प्रमाण नहीं है। भुगतान से पहले संस्था की पहचान और सेवा की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। अनजान लिंक पर भुगतान नहीं करना चाहिए तथा यूपीआई पिन, ओटीपी और बैंक संबंधी गोपनीय जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए।
डॉ. जालमसिंह, साइबर एक्सपर्ट