
जैसलमेर. जैसलमेर को कपास का उभरता बड़ा क्षेत्र बनने में अभी समय है, लेकिन सरकारी आंकड़े थार में कपास की एक छोटी और वास्तविक मौजूदगी जरूर दिखाते हैं। राजस्थान के आर्थिक एवं सांख्यिकी निदेशालय की टाइमली रिपोर्टिंग स्कीम (टीआरएस) की 2024-25 रिपोर्ट में जैसलमेर में कपास का क्षेत्र 500 हेक्टेयर दर्ज है। इसमें 500 हेक्टेयर सिंचित और असिंचित क्षेत्र शून्य है। टीआरएस चयनित गांवों के नमूना सर्वे से फसल क्षेत्र के त्वरित अनुमान तैयार करती है, इसलिए इसे जिले का अंतिम उत्पादन आंकड़ा नहीं माना जा सकता। वर्ष 2024-25 के अंतिम राज्य अनुमान में राजस्थान का कपास रकबा 6,27,391 हेक्टेयर, उत्पादकता 484 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और उत्पादन 17,87,714 गांठ रहा। सरकारी दस्तावेज में कपास उत्पादन की गणना 170 किलोग्राम की गांठ में की गई है। राज्य के अंतिम रकबे के मुकाबले जैसलमेर के 500 हेक्टेयर की हिस्सेदारी करीब 0.08 प्रतिशत बैठती है।
राजस्थान के 2025-26 के अंतिम अनुमान में कपास का क्षेत्र 6,43,699 हेक्टेयर, उत्पादकता 450 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और उत्पादन 17,04,054 गांठ दर्ज हुआ। यानी एक साल में राज्य का कपास रकबा बढ़ा, लेकिन औसत उत्पादकता 484 से घटकर 450 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रह गई। यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल रकबा बढ़ना खेती की आर्थिक सफलता का प्रमाण नहीं है।थार में कपास की संभावना का मूल्यांकन केवल खेत में खड़ी फसल से नहीं हो सकता। असली कसौटी होगी कि एक हेक्टेयर कपास में कितना पानी लगता है, सिंचाई पर कितना खर्च आता है, उत्पादन कितना मिलता है और सभी लागत निकालने के बाद किसान की शुद्ध आय कितनी बचती है।
- प्रति हेक्टेयर पानी की वास्तविक खपत और सिंचाई लागत
-स्थानीय मिट्टी और तापमान के अनुकूल किस्म
-प्रति हेक्टेयर उत्पादन और किसान की शुद्ध आय
-चुनाई, भंडारण और परिवहन की लागत
जिनिंग और खरीद केंद्र तक बाजार पहुंच
कपास की कहानी खेत पर खत्म नहीं होती। बालोतरा में विकसित औद्योगिक और टेक्सटाइल आधार क्षेत्रीय मूल्य-श्रृंखला के लिए संभावित बाजार बन सकता है। आरआइआइसीओ के दस्तावेजों में बालोतरा में टेक्सटाइल इकाइयों और औद्योगिक क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है। आरआइआइसीओ की 2026 की सूचनाओं में भी बालोतरा क्षेत्र से जुड़े नए औद्योगिक विकास दर्ज हैं, लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड यह साबित नहीं करते कि जैसलमेर में पैदा होने वाली वर्तमान कपास सीधे बालोतरा की इकाइयों तक पहुंच रही है। इसलिए इसे मौजूदा आपूर्ति-श्रृंखला कहना सही नहीं होगा। यदि जैसलमेर में कपास लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ साबित होती है तो उत्पादन से जिनिंग, प्रसंस्करण, परिवहन और टेक्सटाइल उद्योग तक क्षेत्रीय मूल्य-श्रृंखला विकसित होने की संभावना बन सकती है।
केंद्र सरकार ने 5 मई 2026 को कपास उत्पादकता मिशन—कपास क्रांति को मंजूरी दी। पांच वर्ष के मिशन के लिए 5,659.22 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इसमें उत्पादकता बढ़ाने, अनुसंधान एवं तकनीक, बेहतर किस्मों, कीट जोखिम प्रबंधन, फसल के बाद की गतिविधियों और किसान से टेक्सटाइल उद्योग तक मूल्य-श्रृंखला मजबूत करने पर जोर है। यहां कपास का भविष्य ज्यादा रकबे से नहीं, बल्कि कम पानी में बेहतर उत्पादन और लागत के मुकाबले बेहतर शुद्ध आय से तय किए जाने की दरकार है।
जैसलमेर जैसे शुष्क जिले में कपास की सफलता पैमाना रकबा प्रति इकाई पानी और लागत से मिलने वाली आय होना चाहिए। चयनित गांवों में सीमित मॉडल प्लॉट बनाकर किस्म, सिंचाई, उत्पादन, लागत और बाजार भाव का तुलनात्मक परीक्षण करके इसका विस्तार किया जा जा सकता है । दूसरी फसलों से बेहतर शुद्ध आय प्राप्त होने पर कपास विस्तार को आर्थिक आधार मिलेगा।
-डॉ. चारु शर्मा, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, जैसलमेर