जैसलमेर

कभी थी होली की शान,अब घट रहे कद्रदान,सिमटती परंपराओं में घट रहा चंग का महत्व

-सिमटती परंपराओं में घट रहा चंग का महत्व
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Mar 19, 2019
jaisalmer
कभी थी होली की शान,अब घट रहे कद्रदान,सिमटती परंपराओं में घट रहा चंग का महत्व

जैसलमेर. होलकाष्ट के बाद से स्वर्णनगरी में होली का रंग जमना शुरू हो चुका है, लेकिन निराशाजनक है कि चंग बजाते व होली गीतों को मस्ताना अंदाज में गाते व मचलते लोग इक्का - दुक्का जगह ही दिखाई दे रहे हैं। वैसे तो स्वर्णनगरी में होली पर्व के आगाज के साथ ही गैरियों व होली के रसियों का उन्माद झलकना शुरू हो जाता है, लेकिन इस बार न तो चंग की थाप पर झूमने वाले दीवाने दिखाई दे रहे हैं और न ही वाद्य यंत्र चंग के कद्रदान। ऐसे में चंग बनाने वाले कारीगर सिमटती परम्पराओं व घटती कद्रदानों की संख्या से काफी मायूस है। चंग बनाने वाले कारीगर बताते हैं कि वे दिन बीत गए जब चंग खरीदने सैकड़ों लोग उसके पास प्रतिदिन आते थे। जीवन शैली में आए बदलाव के साथ ही चंग को लेकर रुझान जैसाण में कम ही देखने को मिल रहा है। यही कारण है कि होली का खास वाद्य माने जाने वाले चंग को बनाने वाले हाथ भी थम से गए है। होली की मस्ती व उल्लास के रंग में रंगे लोगों की सीमा गली व नुक्कड़ों तक ही सीमित रह गई है। यही कारण है कि खुशियों को दर्शाने वाले चंग की मांग दिनों दिन घट रही है। बाजार में कृत्रिम चंगों की उपलब्धता ने भी इसकी लोकप्रियता को कम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
यूं बनता है चंग
-मृत नर भेड़ के चमड़े को सूखाकर व धूप में कठोर होने के लिए छोड़ दिया जाता है।
-इसके बाद लकड़ी के वृताकार वलय में इस खाल को चढ़ा कर चंग का निर्माण किया जाता है।
-पूर्ण निर्माण के बाद इस पर हल्दी व इच्छानुसार व अन्य खुशबूदार रसायनों का लेप किया जाता है।

होली की मस्ती व उल्लास के रंग में रंगे लोगों की सीमा गली व नुक्कड़ों तक ही सीमित रह गई है। यही कारण है कि खुशियों को दर्शाने वाले चंग की मांग दिनों दिन घट रही है। बाजार में कृत्रिम चंगों की उपलब्धता ने भी इसकी लोकप्रियता को कम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

Updated on:
19 Mar 2019 04:47 pm
Published on:
19 Mar 2019 04:47 pm