श्रद्धा के आगे कोई मुश्किल नहीं आती नजर!
पोकरण. लोकदेवता रुणीचे के धणी बाबा रामदेव की समाधि स्थल के दर्शनों के लिए अपने-अपने घर से सैंकड़ों मील दूर के सफर में निकल पड़े भक्तों के राह के रोड़े उनकी श्रद्धा और हौसलों के आगे बौने साबित हो रहे है। बच्चे हो या बड़े, कोई दंडवत तो कोई पैदल नंगे पैर, पैरों में पड़ते फाले, न विश्राम का पता और न भोजन का, कभी उमस और गर्मी में पसीना-पसीना, तो कभी धूल भरी आंधी के तेज झोंकें, प्रतिदिन तीस से चालीस किमी का पैदल सफर और चंद घंटों के विश्राम के बाद फिर चल पड़ते है उसी राह में। घर से एक साथ निकलते है, तो बीच राह में कोई आगे तो कोई पीछे रह जाता है, इस सफर में पेट की आग और कंठ की तृष्णा भी अपने कंधे पर उठाए रखते है। इतना सब-कुछ होते हुए भी बाबा के भक्तों की श्रद्धा व हौसला अपरम्पार है। राह की हर छोटी-मोटी तकलीफ को वे बाबा का प्रसाद मानते हुए सह लेते है।
चहुंओर बाबा के जयकारे
उनकी राह में कष्टों के रोड़े होते हुए भी बाबा के जयकारे गूंज रहे है। इनकी श्रद्धा और भक्ति देखकर स्थानीय लोग भी उनकी सेवा में आगे आने को मजबूर हो जाते है। इनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होती। मेले में पहुंचने के बाद पहले तो घंटों दर्शन के लिए कतार में खड़ा रहना, फिर भोजन और विश्राम भी खुले आसमान तले। समाधि स्थल के निकट रामसरोवर तालाब की पाल व यहीं पर स्थित गांव के श्मशान घाट में भी श्रद्धालु विश्राम करते व भोजन पकाते नजर आ जाते है। ऐसे में भक्तों की श्रद्धा का अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है। देश के कोने-कोने से आए पदयात्री बताते है कि रास्ते व दर्शन के दौरान जो भी मुश्किलें आती हैं, वे बाबा की शक्ति पर ही मुश्किलें पार कर लेते है। उनके लिए छोटी-मोटी तकलीफें कोई मायने नहीं रखती। रामदेवरा में बाजार में रोनक नजर आ रही है। चढ़ावे की दुकानों पर तो भीड़ है ही, इसके अलावा बाबा की तस्वीरों, भजनों की कैसेट्स व साहित्यिक सामग्री की दुकानों के अलावा पोकरण व जैसलमेर निर्मित हस्तकला तथा पारंपरिक वस्त्रों की दुकानों पर खरीदारों की भीड़ उमड़ रही है। बाजार की कई गलियां तो मेलार्थियों से गत एक पखवाड़े से दिन-रात भरी हुई है।