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पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में गोडावण संरक्षण को सराहा…जैसलमेर मॉडल बना प्रेरणा

डेजर्ट नेशनल पार्क क्षेत्र में गोडावण संरक्षण के लिए सुदासरी और रामदेवरा में स्थापित ब्रीडिंग सेंटर अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन केंद्रों में आधुनिक तकनीकों की मदद से प्रजनन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ के 133वें एपिसोड में सरहदी जैसलमेर जिले में चल रहे गोडावण संरक्षण प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कभी रेगिस्तानी इलाकों की पहचान हुआ करता था, लेकिन घटती संख्या के कारण यह पक्षी विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया था। अब संरक्षण अभियानों और वैज्ञानिक प्रयासों के चलते इसमें नई उम्मीद दिखाई दे रही है।

डेजर्ट नेशनल पार्क क्षेत्र में गोडावण संरक्षण के लिए सुदासरी और रामदेवरा में स्थापित ब्रीडिंग सेंटर अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन केंद्रों में आधुनिक तकनीकों की मदद से प्रजनन को बढ़ावा दिया जा रहा है। हाल के वर्षों में आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन तकनीक के उपयोग से गोडावण के प्रजनन में सफलता मिली है, जो संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। वन विभाग के अनुसार गोडावण की प्राकृतिक प्रजनन दर बेहद धीमी होती है, जिससे इनकी संख्या तेजी से बढ़ाना चुनौतीपूर्ण रहा है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने तकनीकी हस्तक्षेप के जरिए प्रजनन प्रक्रिया को गति दी है। हाल ही में फीमेल गोडावण ‘जेरी’ और मेल ‘पर्व’ के जरिए एआइ तकनीक से चूजे का जन्म होना बड़ी सफलता माना जा रहा है। इस तकनीक से अंडों के सफल निषेचन की संभावना कई गुना बढ़ गई है। वर्ष 2026 में गोडावण की संख्या बढ़कर करीब 200 तक पहुंच चुकी है, जो पिछले वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाती है। यह उपलब्धि संरक्षण कार्यों की प्रभावशीलता को साबित करती है।

एआइ तकनीक से बढ़ा प्रजनन, विलुप्ति के कगार से लौट रही सोन चिड़िया

अब अगला चरण ‘सॉफ्टरिलीज’ का है, जिसमें ब्रीडिंग सेंटर में पले पक्षियों को धीरे-धीरे प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा जाएगा, ताकि वे खुद प्रजनन कर सकें। इसके साथ ही बिजली लाइनों पर बर्ड डायवर्टर लगाने जैसे कदमों से वन्य क्षेत्र में मृत्यु दर कम करने के प्रयास भी जारी हैं।

यूं चल रहा प्रोजेक्ट गोडावण

गौरतलब है कि 2018-19 में केंद्र और राज्य स्तर पर ‘प्रोजेक्टगोडावण’ शुरू हुआ था। वर्ष 2019 में सुदासरी में पहला ब्रीडिंग सेंटर स्थापित हुआ, जबकि 2022 में रामदेवरा में दूसरा केंद्र शुरू किया गया। यहां ‘हच टू आउट’ तकनीक अपनाई जा रही है, जिसमें जोखिम वाले अंडों को सुरक्षित वातावरण में विकसित किया जाता है।