
जैसलमेर. किसी भी शहर का भविष्य उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि उन खाली भूखंडों से तय होता है, जिन पर आने वाले वर्षों में सड़कें बननी हैं, पार्क विकसित होने हैं, अस्पताल खड़े होने हैं और बच्चों के खेलने के मैदान तैयार होने हैं। जैसलमेर में यही भविष्य धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। शहर के कई हिस्सों में सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। चिंता केवल अतिक्रमण की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी है, जो शुरुआती स्तर पर कार्रवाई करने में चूक जाती है और जब तक प्रशासन मौके पर पहुंचता है, तब तक अस्थायी कब्जा पक्के निर्माण में बदल चुका होता है। जैसलमेर में पिछले कुछ वर्षों में भूमि की कीमतों में कई गुना वृद्धि हुई है। इसके साथ ही सरकारी भूखंडों पर कब्जे की प्रवृत्ति भी तेज हुई है। पहले अस्थायी बाड़, टीनशेड या झोंपड़ी बनाई जाती है, फिर बिजली-पानी के कनेक्शन, उसके बाद पक्का निर्माण और अंततः कानूनी विवाद। इस पूरी प्रक्रिया में सार्वजनिक भूमि धीरे-धीरे निजी दायरों में बदल जाती है। अब अतिक्रमण केवल खाली पड़ी जमीन तक सीमित नहीं है। निशाने पर वे भूखंड हैं जो भविष्य की नागरिक सुविधाओं के लिए आरक्षित हैं।
-प्रस्तावित सड़क और चौड़ीकरण क्षेत्र
-पार्क एवं हरित क्षेत्र
- सरकारी संस्थानों के लिए आरक्षित भूखंड
-विद्यालय एवं सार्वजनिक भवनों की भूमि
नालों और जल निकासी मार्गों के आसपास का क्षेत्र
प्रशासनिक सूत्र बताते हैं कि अधिकांश मामलों में कब्जे की शुरुआत बेहद छोटे स्तर से होती है। यदि उसी समय कार्रवाई हो जाए तो समस्या समाप्त हो सकती है, लेकिन कई मामलों में शिकायतों के बावजूद समय पर हस्तक्षेप नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप कुछ महीनों में अस्थायी ढांचा स्थायी निर्माण में बदल जाता है। इसके बाद कार्रवाई कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर जटिल हो जाती है।
रियल एस्टेट बाजार में तेजी के साथ सरकारी जमीनों की कीमत भी अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जहां भूमि का बाजार मूल्य तेजी से बढ़ता है, वहां सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जों का जोखिम भी बढ़ जाता है। जैसलमेर इसका अपवाद नहीं है।
जैसलमेर में अतिक्रमण का मुद्दा केवल जमीन का नहीं, बल्कि शहर के भविष्य का है। आज जिस भूखंड पर कब्जा हो रहा है, वहीं कल किसी अस्पताल की जरूरत पड़ सकती है, किसी स्कूल का विस्तार होना हो सकता है या किसी नई सड़क का मार्ग निकलना हो सकता है। यदि सार्वजनिक जमीनें इसी गति से निजी कब्जों में बदलती रहीं, तो आने वाले वर्षों में शहर के विकास की सबसे बड़ी कीमत उसके नागरिकों को चुकानी पड़ेगी। इसलिए सवाल केवल कब्जे हटाने का नहीं, बल्कि शहर के भविष्य को बचाने का है।