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जैसलमेर: तबादलों का बंद दरवाजा, आठ वर्षों से इंतजार में सबसे बड़ा शिक्षक वर्ग

राज्य सरकार के हालिया तबादला सत्र में कई विभागों और शिक्षा विभाग के अन्य संवर्गों को राहत मिली, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षक एक बार फिर स्थानांतरण से वंचित रह गए। वर्ष 2018 से नियमित तबादले बंद होने के कारण अध्यापक लेवल प्रथम एवं द्वितीय वर्षों से एक ही स्थान पर कार्यरत हैं। इसे लेकर शिक्षक संगठनों ने संवर्गों के बीच भेदभाव का आरोप लगाते हुए शीघ्र तबादला नीति लागू करने की मांग तेज कर दी है।
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जैसलमेर. राज्य सरकार ने हालिया तबादला सत्र में विभिन्न विभागों के कर्मचारियों और शिक्षा विभाग के कई संवर्गों को स्थानांतरण की राहत दी, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षकों, जिसमें अध्यापक लेवल प्रथम एवं द्वितीय शामिल है, के लिए तस्वीर नहीं बदली। वर्ष 2018 के बाद से इस संवर्ग के नियमित स्थानांतरण बंद हैं, जबकि हर साल नीति बनने और प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद जगती है। नतीजा यह है कि हजारों शिक्षक वर्षों से एक ही स्थान पर सेवा देने को मजबूर हैं। शिक्षा विभाग के अन्य संवर्गों में समय-समय पर तबादले होते रहे, लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षक लगातार प्रतीक्षा सूची में बने हुए हैं। इसी कारण शिक्षक संगठनों का आरोप है कि एक ही विभाग के भीतर अलग-अलग संवर्गों के लिए अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं।

डेटा जो पूरी तस्वीर बताता है

प्रदेश में तृतीय श्रेणी शिक्षकों की संख्या ही बताती है कि मामला कितना बड़ा है। यानी दो लाख 35 हजार से अधिक शिक्षकों का संवर्ग आठ वर्षों से नियमित स्थानांतरण व्यवस्था का इंतजार कर रहा है।

प्रारंभिक शिक्षा

-अध्यापक लेवल प्रथम : 1,00,116

-अध्यापक लेवल द्वितीय : 49,333

माध्यमिक शिक्षा

-अध्यापक लेवल प्रथम : 45,216

-अध्यापक लेवल द्वितीय : 40,985

-कुल तृतीय श्रेणी शिक्षक : 2,35,650

2018 के बाद थम गई प्रक्रिया

तृतीय श्रेणी शिक्षकों के नियमित तबादले जुलाई 2018 में हुए थे। इसके बाद हर सरकार ने स्थानांतरण नीति का संकेत दिया, लेकिन कोई स्थायी व्यवस्था लागू नहीं हो सकी।

बीते वर्षों में यह घटनाक्रम सामने आया—

-2018 के बाद नियमित तबादले नहीं।

-पिछली सरकार में शाला दर्पण पोर्टल पर करीब 85 हजार आवेदन आमंत्रित।

-आवेदन लेने के बावजूद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।

-नई सरकार में भी नीति का इंतजार जारी।

यानी उम्मीदें बनीं, लेकिन परिणाम नहीं मिले।

समितियां बनती रहीं, फैसला नहीं आया

1994 : पहली समिति।

1997-98 : प्रक्रिया सरकार बदलने से रुकी।

2005 : फिर प्रयास।

2015-16 : नई समितियां गठित।

2020 : रिपोर्ट भी तैयार, लेकिन अमल नहीं।

करीब तीन दशक में कई समितियां बनीं, लेकिन स्थायी नीति आज भी लागू नहीं हो सकी।

लंबे समय तक तबादले नहीं होने का असर केवल नौकरी तक सीमित नहीं है।

-पति-पत्नी अलग-अलग जिलों में।

-छोटे बच्चों की पढ़ाई और देखभाल प्रभावित।

-गंभीर बीमारी और दिव्यांग परिस्थितियों में भी राहत नहीं।

-एकल महिला शिक्षकों को अतिरिक्त कठिनाइयां।

-मानसिक तनाव और आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा।

-शिक्षकों का कहना है कि स्थानांतरण सुविधा नहीं, पारिवारिक संतुलन का माध्यम भी है।

-प्रतिनियुक्ति का विकल्प, लेकिन सबके लिए नहीं

प्रतिनियुक्ति का विकल्प

शिक्षक संगठनों का आरोप है कि प्रभावशाली लोग प्रतिनियुक्ति के जरिए मनचाहे स्थान तक पहुंच जाते हैं, जबकि अधिकांश शिक्षक वर्षों तक प्रतीक्षा करते रहते हैं। इससे व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।

जिला कैडर पर बहस

सरकार की ओर से समय-समय पर जिला कैडर का तर्क दिया जाता रहा है। दूसरी ओर शिक्षक संगठनों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया राज्यस्तरीय परीक्षा और मेरिट से होती है। उनका तर्क है कि यदि चयन राज्य स्तर पर है तो केवल नियुक्ति का माध्यम जिला परिषद होने से स्थानांतरण व्यवस्था सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसी आधार पर समान अवसर और सेवा संरचना को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है।

पिछले आठ वर्षों से तृतीय श्रेणी शिक्षकों के साथ असमान व्यवहार हो रहा है। नीति के नाम पर लगातार देरी की जा रही है। यदि शीघ्र स्थानांतरण प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो प्रदेशव्यापी आंदोलन का निर्णय लिया जा सकता है।

-विजय कुमार, प्रदेशध्यक्ष, प्राथमिक अध्यापक संघ (लेवल प्रथम)

फैक्ट बॉक्स

8 वर्ष — नियमित तबादले बंद

2018 — अंतिम स्थानांतरण

85,000 — पोर्टल पर प्राप्त आवेदन (पिछली सरकार)

2,35,650 — प्रदेश में तृतीय श्रेणी शिक्षकों की कुल संख्या

5 प्रमुख समितियां — तीन दशक में गठन, स्थायी नीति अब भी लंबित