
सरहदी जिले के युवाओं को आधुनिक प्रशिक्षण की दरकार। फोटो - पत्रिका
जैसलमेर. दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, हरित ऊर्जा और डिजिटल तकनीक पारंपरिक नौकरियों की जगह नए अवसर पैदा कर रहे हैं। ऐसे दौर में भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल रोजगार का नहीं, बल्कि रोजगार योग्य कौशल का है। इसी संदेश के साथ हर वर्ष 15 जुलाई को विश्व युवा कौशल दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 2014 में इस दिवस की शुरुआत युवाओं को रोजगार, सम्मानजनक काम और उद्यमिता के लिए कौशल से जोड़ने के उद्देश्य से की थी। भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। यही जनसांख्यिकीय ताकत आने वाले वर्षों में देश की सबसे बड़ी आर्थिक पूंजी बन सकती है, लेकिन तभी जब शिक्षा और उद्योग के बीच मौजूद कौशल अंतर को तेजी से कम किया जाए। संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को का भी मानना है कि भविष्य के रोजगार केवल तकनीकी ज्ञान से नहीं, बल्कि डिजिटल, एआई, हरित और सामाजिक कौशल के संतुलित विकास से तय होंगे।
कॉरपोरेट जगत अब केवल डिग्री नहीं देख रहा। कंपनियां ऐसे युवाओं की तलाश में हैं जो समस्या का समाधान कर सकें, नई तकनीक अपनाने में सक्षम हों और बदलते कार्य वातावरण के अनुरूप स्वयं को लगातार अपडेट करते रहें। आज सबसे अधिक मांग जिन क्षेत्रों में बढ़ रही है, उनमें शामिल हैं—
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग
-साइबर सुरक्षा
-ड्रोन संचालन
-ग्रीन एनर्जी
-इलेक्ट्रिक व्हीकल
-रोबोटिक्स
-डेटा एनालिटिक्स
-डिजिटल मार्केटिंग
-पर्यटन एवं हॉस्पिटैलिटी
-हेल्थकेयर और स्किल ट्रेड
भारत हर वर्ष लाखों नए युवाओं को श्रम बाजार में प्रवेश करते देखता है। ऐसे में केवल पारंपरिक शिक्षा पर्याप्त नहीं होगी। इसी सोच के साथ केंद्र सरकार ने स्किल इंडिया मिशन, व्यावसायिक प्रशिक्षण और उद्योग आधारित कौशल विकास कार्यक्रमों पर लगातार जोर बढ़ाया है। हाल के वर्षों में नीति-निर्माता भी भविष्य की जरूरतों के अनुरूप राष्ट्रीय कौशल ढांचे को आधुनिक बनाने पर बल दे रहे हैं।
यह बदलाव केवल दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे या हैदराबाद तक सीमित नहीं है। राजस्थान का जैसलमेर इसका उदाहरण बन सकता है। यहां हर वर्ष लाखों पर्यटक पहुंचते हैं। यदि पर्यटन, विदेशी भाषाओं, डिजिटल ट्रैवल, होटल प्रबंधन, रेगिस्तानी एडवेंचर, लोक संस्कृति, ई-कॉमर्स और हस्तशिल्प विपणन जैसे क्षेत्रों में युवाओं को आधुनिक प्रशिक्षण मिले, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था राष्ट्रीय रोजगार मॉडल का हिस्सा बन सकती है। यानी स्किल वहीं, रोजगार वहीं—यह मॉडल पलायन भी कम कर सकता है और स्थानीय आय भी बढ़ा सकता है।
अगले दशक में देशों की प्रतिस्पर्धा प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि कुशल मानव संसाधन से तय होगी। जिन देशों के युवा नई तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था और हरित उद्योगों के अनुरूप प्रशिक्षित होंगे, वही वैश्विक निवेश और रोजगार के केंद्र बनेंगे। संयुक्त राष्ट्र भी भविष्य के लिए तकनीकी, डिजिटल और मानवीय कौशल के संतुलित विकास पर जोर दे रहा है।
- विकास शर्मा, श्रम बाजार विशेषज्ञ
Updated on:
14 Jul 2026 08:39 pm
Published on:
14 Jul 2026 08:39 pm
