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Jaisalmer: मानसून संग बढ़ता सर्पदंश संकट… देश में हर वर्ष अनुमानित 58 हजार मौत

जैसलमेर सहित देशभर में मानसून के साथ सर्पदंश का खतरा भी बढ़ जाता है, जो हर वर्ष हजारों लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट बनता है। 16 जुलाई का विश्व सर्प दिवस अब केवल सांपों के संरक्षण का नहीं, बल्कि समय पर उपचार, वैज्ञानिक जागरूकता और ग्रामीण स्वास्थ्य सुरक्षा का भी संदेश देता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार सर्पदंश से होने वाली मौतों और विकलांगता में कमी लाने के लिए विशेष कार्ययोजना पर काम कर रहे हैं।
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एआई इफेक्ट

जैसलमेर. मानसून जहां खेती और जलस्रोतों के लिए राहत लेकर आता है, वहीं हर वर्ष एक ऐसा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भी गहरा जाता है, जो हजारों परिवारों को प्रभावित करता है। खेतों, ग्रामीण बस्तियों और जलभराव वाले इलाकों में सांपों की सक्रियता बढ़ने के साथ सर्पदंश के मामले भी बढ़ जाते हैं। यही कारण है कि 16 जुलाई को मनाया जाने वाला विश्व सर्प दिवस अब केवल वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य, आपात चिकित्सा और वैज्ञानिक जागरूकता से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सर्पदंश को उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग की श्रेणी में रखा है। संगठन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक सर्पदंश से होने वाली मौतों और गंभीर विकलांगता में 50 प्रतिशत कमी लाना है। भारत सरकार ने भी इसी लक्ष्य के अनुरूप नेशनल एक्शन प्लान फॉर प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ स्नेकबाइट एनवेनमिंग लागू किया है।

राष्ट्रीय अध्ययन ने बढ़ाई चिंता

मिलियन डेथ स्टडी के अनुसार भारत में हर वर्ष सर्पदंश से लगभग 58 हजार मौतों का अनुमान है। यानी औसतन प्रतिदिन करीब 160 और लगभग हर घंटे 6 से 7 लोगों की मृत्यु होने का अनुमान लगाया गया है। अधिकांश मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं, जहां लोग खेती, पशुपालन और खुले वातावरण में काम करते हैं। मानसून के दौरान सर्पदंश के मामलों में वृद्धि देखी जाती है और समय पर उपचार नहीं मिलने से जोखिम बढ़ जाता है।

हर सांप विषैला नहीं, लेकिन हर सर्पदंश को गंभीर मानना जरूरी

भारत सरकार के राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के अनुसार देश में लगभग 310 प्रजातियों के सांप पाए जाते हैं। इनमें 23 प्रजातियों को चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। अधिकांश गंभीर सर्पदंश तथाकथित बिग फोर—इंडियन कोबरा, कॉमन करैत, रसेल्स वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर—से जुड़े होते हैं। यही चार प्रजातियां देश में अधिकांश गंभीर विषाक्तता और मौतों के लिए जिम्मेदार मानी जाती हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश सांप इंसानों पर हमला नहीं करते। अधिकतर घटनाएं तब होती हैं, जब उन पर अनजाने में पैर पड़ जाता है या वे स्वयं को खतरे में महसूस करते हैं।

जैसलमेर: रेगिस्तान भी अछूता नहीं

सर्पदंश की चर्चा अक्सर जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित रहती है, लेकिन पश्चिमी राजस्थान का जैसलमेर भी इससे पूरी तरह अछूता नहीं है। मानसून के दौरान नहरी क्षेत्रों, कृषि भूमि और ग्रामीण बस्तियों में सांपों के दिखाई देने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार वर्षा के बाद बिलों में पानी भरने पर सांप सुरक्षित स्थानों की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर आ सकते हैं। ऐसे में किसानों, पशुपालकों, ग्रामीणों और रेगिस्तानी पर्यटन से जुड़े लोगों के लिए जागरूकता और त्वरित चिकित्सा सुविधा बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

अंधविश्वास अब भी बड़ी चुनौती

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सर्पदंश से होने वाली बड़ी संख्या में मौतें समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने और अंधविश्वास के कारण होती हैं। कई क्षेत्रों में लोग आज भी झाड़-फूंक या घरेलू उपचार में बहुमूल्य समय गंवा देते हैं। चिकित्सकों के अनुसार एंटी-स्नेक वेनम ही विषैले सर्पदंश का वैज्ञानिक और प्रमाणित उपचार है। मरीज को शांत रखना, प्रभावित अंग को यथासंभव स्थिर रखना और बिना देरी निकटतम अस्पताल पहुंचाना सबसे प्रभावी प्राथमिक कदम हैं।

तीन स्तर पर हो प्रभावी कार्य

सर्पदंश के बारे में जानकारी की कमी, उपचार में देरी और अंधविश्वास आज भी भारत में हजारों लोगों की जान ले रहे हैं। जैसलमेर के रेतीले इलाकों से लेकर पूर्वोत्तर के वर्षावनों तक चुनौती एक जैसी है—वैज्ञानिक जागरूकता, समय पर उपचार और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं। यदि इन तीन मोर्चों पर प्रभावी काम हो, तो सर्पदंश से होने वाली हजारों मौतों को रोका जा सकता है।

- विक्रम कुमार, सर्प दंश विशेषज्ञ

आमजन दिखाए जागरुकता

सर्पदंश को केवल वन विभाग या स्वास्थ्य विभाग तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आमजन को भी जागरुकता दिखानी होगी। सर्पदंश होने पर तुरंत रोगी को चिकित्सालय पहुंचाना चाहिए। इसका प्रभावी उपचार मौजूद है। भारत का राष्ट्रीय कार्ययोजना दस्तावेज़ वन हेल्थ दृष्टिकोण पर विशेष जोर देता है।

- डॉ आरके पालीवाल, सीएमएचओ, जैसलमेर