मरुधरा में पितृत्व की पारंपरिक परिभाषा बदल रही है और पिता अब केवल परिवार के पालन-पोषण तक सीमित नहीं रहे। वे बच्चों की शिक्षा, करियर, संस्कार और भावनात्मक विकास में सक्रिय भागीदारी निभाते हुए उनके मार्गदर्शक और प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक बदलती यह सोच परिवारों में संवाद और बच्चों के आत्मविश्वास को नई मजबूती दे रही है।

केस-1 : शहर के निवासी अजय शर्मा रोजाना नौकरी से लौटने के बाद अपने दोनों बच्चों के साथ पढ़ाई करते हैं। वे स्कूल प्रोजेक्ट तैयार कराने, प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी देने और कॅरियर विकल्पों पर चर्चा करने के लिए नियमित समय निकालते हैं। उनका कहना है कि बच्चों के साथ बिताया गया समय ही उनके भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है।
केस-2 : महेशसिंह ने अपनी बेटी को उच्च शिक्षा के साथ आत्मरक्षा प्रशिक्षण भी दिलाया है। वे हर स्कूल कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिता और अभिभावक बैठक में शामिल होते हैं। उनका मानना है कि बेटियों को अवसर, सुरक्षा और आत्मविश्वास देना हर पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। परिवार का सहयोग ही बेटियों को आत्मनिर्भर बनाता है।
केस-3 : व्यस्त व्यवसाय के बावजूद हनीफ खान रोज शाम को बच्चों के साथ समय बिताते हैं। वे मोबाइल और सोशल मीडिया के सुरक्षित उपयोग से लेकर जीवन की छोटी-बड़ी परेशानियों तक हर विषय पर खुलकर बातचीत करते हैं। उनका मानना है कि बच्चों को केवल अनुशासन नहीं, बल्कि भरोसे और संवाद की भी जरूरत होती है।
केस 4: राकेश चौधरी अपने बच्चों की खेल, सांस्कृतिक और रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। वे हर उपलब्धि पर बच्चों का उत्साह बढ़ाते हैं और असफलता के समय उनका मनोबल मजबूत करते हैं। उनका कहना है कि बच्चों को सफलता से अधिक यह विश्वास चाहिए कि हर परिस्थिति में पिता उनके साथ खड़े हैं।
जैसलमेर. मरुधरा की सामाजिक तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है। कभी पिता की भूमिका मुख्य रूप से परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी करने तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। जैसलमेर में आज के पिता केवल कमाने वाले नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर उनके साथी, मार्गदर्शक और प्रेरक बनकर सामने आ रहे हैं। वे बच्चों की पढ़ाई, करियर की योजना, स्कूल गतिविधियों, खेल, संस्कार, भावनात्मक सहयोग और डिजिटल दुनिया की चुनौतियों को समझाने में बराबर की भूमिका निभा रहे हैं। बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और सशक्तीकरण को लेकर भी पिताओं की सोच पहले से कहीं अधिक सकारात्मक और जागरूक हुई है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक अनेक परिवारों में पिता अब बच्चों के साथ अधिक समय बिताने को प्राथमिकता दे रहे हैं। स्कूल की पैरेंट्स-टीचर मीटिंग में भाग लेना, होमवर्क में मदद करना, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर चर्चा करना, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में बच्चों का उत्साह बढ़ाना अब सामान्य बात होती जा रही है। परिवारों का मानना है कि पिता की सक्रिय भागीदारी से बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है और परिवार के भीतर संवाद भी मजबूत होता है।
बच्चों के जीवन में पिता की सक्रिय भागीदारी उनके मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास को सकारात्मक दिशा देती है। जब पिता पढ़ाई, संवाद, निर्णय, स्कूल गतिविधियों और बेटियों के सशक्तीकरण में बराबरी से साथ खड़े होते हैं, तब बच्चों में आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और सुरक्षा की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।
— मुकेश व्यास, अध्यक्ष बाल कल्याण समिति, जैसलमेर