
जैसलमेर. पौ फटने के साथ ही शहर की गलियों और मोहल्लों में महिलाओं की चहल-पहल शुरू हो गई। हाथों में पूजन सामग्री और मन में संतानों की सलामती की कामना लिए महिलाएं गाय और बछड़े के पूजन में जुट गईं। जिलेभर में बच्छ-बारस का पर्व इसी आस्था, परंपरा और उत्साह के साथ मनाया गया। ब्रह्म मुहूर्त में महिलाओं ने गाय और बछड़े की पूजा-अर्चना की। पुत्रवती महिलाओं ने बेटों के माथे पर अक्षत-तिलक लगाया, नजर उतारी और प्रसाद खिलाकर उनकी दीर्घायु की कामना की। घर-घर में बच्छ-बारस की कथा पढ़ी और सुनी गई। भादवा कृष्ण द्वादशी पर महिलाओं ने पूरे दिन पर्व से जुड़ी परंपराओं का पालन किया।
बच्छ-बारस पर धार्मिक आस्था के साथ पारंपरिक खानपान की झलक भी देखने को मिली। घरों में बाजरी और ज्वार की रोटियां बनाई गईं। भोजन में बकरी और भैंस के दूध तथा उनसे बने घी का उपयोग किया गया। परिवारों ने बाजरी-ज्वार की रोटियों के साथ बैरवा और चावल का आहार लिया। महिलाओं ने गायों के लौटने से पहले और सूर्यास्त से पूर्व भोजन किया।
पर्व पर नवविवाहित जोड़ों में भी उत्साह नजर आया। उन्होंने गाय और बछड़े का पूजन कर परिवार की सुख-शांति और खुशहाली की कामना की। शहर के विभिन्न गली-मोहल्लों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक दिनभर धार्मिक माहौल बना रहा। सुबह शुरू हुआ पूजन का सिलसिला शाम तक पर्व की परंपराओं के साथ जारी रहा। बच्छ-बारस ने एक बार फिर जैसलमेर की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं की वह तस्वीर सामने रखी, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ परिवार, पशुधन और लोकजीवन का जुड़ाव दिखाई देता है।
पोकरण. कस्बे में मंगलवार को बच्छ बारस का पर्व परंपरागत रूप से मनाया गया। इस मौके पर पुत्रवती महिलाओं ने गाय व बछड़े की पूजा-अर्चना की। कस्बे में सुबह से ही महिलाएं पूजा की थाली सजाकर अपने घरों से निकल पड़ी और गायों के बाड़ों व गोशालाओं में जाकर गाय व बछड़े की पूजा-अर्चना की। कस्बे में गाय व बछड़े की पूजा का क्रम सुबह 9 तक भी जारी रहा। गाय व बछड़े को बाजरी के आटे के लड्डु व गुड़ खिलाया। महिलाओं ने जगह-जगह समूहों में बैठकर बच्छ बारस की कथा का श्रवण किया व उनकी रक्षा का संकल्प लिया। महिलाओं ने दिनभर गाय के दूध, उससे निर्मित किसी भी तरह के खाद्य पदार्थ मिठाई व गेहूं के आटे से निर्मित रोटियों आदि का सेवन नहीं कर भैंस या बकरी के दूध और बाजरे की रोटी का भोग लगाकर उसका सेवन किया।