
जैसलमेर/लाठी. परिवार की जिम्मेदारियां उम्र देखकर कम नहीं होतीं। लाठी निवासी 55 वर्षीय गोपीलाल दर्जी भी इसी सोच के साथ जीवन बिता रहे थे। उनके तीन बेटे सिलाई का काम करते थेए लेकिन वे खुद भी जैसलमेर की एक निजी टावर कंपनी में काम कर परिवार का सहारा बने हुए थे। उन्हें क्या पता था कि 14 अक्टूबर 2025 को जैसलमेर से लाठी लौटने के लिए जिस बस में बैठ रहे हैंए वही उनकी जिंदगी का आखिरी सफर बन जाएगी। बस अग्निकांड में गोपीलाल की मौत ने परिवार से उस सदस्य को छीन लियाए जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अपनी मेहनत से घर की जिम्मेदारियां बांट रहा था। हादसे के बाद परिवार की दिनचर्या तो चलती रहीए लेकिन घर से एक ऐसा व्यक्ति चला गया जिसकी मौजूदगी अपनों के लिए भरोसे का आधार थी।
गोपीलाल की पत्नी सुशीला के लिए हादसे के बाद के दिन मानसिक पीड़ा से भरे रहे। वह बताती हैं कि शुरुआती करीब छह महीने तक उन्हें ठीक से नींद नहीं आई। नींद की गोलियां लेने के बाद भी राहत नहीं मिलती थी। रात गुजर जाती, लेकिन मन में उठने वाली बेचैनी कम नहीं होती थी। एक साल बीतने के बाद भी पति की याद उन्हें उस भयावह दिन तक खींच ले जाती है। समय आगे बढ़ाए घर की दिनचर्या भी धीरे.धीरे पटरी पर लौटीए लेकिन पति की कमी ने जीवन को पहले जैसा नहीं रहने दिया।
गोपीलाल के बेटे उम्मेदराम, घनश्याम व हीरालाल का कहना है कि पिता को खोने का दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार बाहर से देखने वालों को लग सकता है कि समय के साथ सब सामान्य हो जाता है, लेकिन परिवार के भीतर का खालीपन वैसा ही बना हुआ है। पिता की मौजूदगी उनके लिए केवल भावनात्मक संबल नहीं थी, बल्कि परिवार की जिम्मेदारियों में एक मजबूत सहारा भी थी। अब उनकी यादें ही उस रिश्ते की निशानी हैं, जिसे कोई दूसरी चीज पूरा नहीं कर सकती। परिजनों के अनुसार गोपीलाल जिस निजी टावर कंपनी में पेट्रोलिंग का काम करते थे, वहां से एक साल बीत जाने के बाद भी परिवार को किसी तरह की मदद नहीं मिली। उनका कहना है कि परिवार के लिए यह स्थिति दु:ख को और गहरा करती है।