-दो दिन पर्व के उत्साह के रंग में सराबोर हो जाएगा आलम-विभिन्न समाजों की निकल रही गैरों से स्वर्णनगरी में मस्ती का माहौल
जैसलमेर. कोरोना की काली रात के बीच मुस्कुराती सुबह की उम्मीद है जैसाण के बाशिंदों की ओर से लगातार दो दिन होली पर्व उत्साह व उल्लास के माहौल में मनाया जाएगा। चारों ओर होली के गीतों और भजनों की धूम मची है। कृष्ण भक्ति की जैसलमेर में सैंकड़ों वर्ष पुरानी परम्परा के कारण यहां की होली में मथुरा, वृंदावन, गोकुल और बरसाना की भांति मंदिरों में भक्ति भाव से ओत प्रोत होकर अबीर-गुलाल उड़ाकर 'ठाकुरजीÓ के साथ फाग खेला जाता है। जैसाण में विभिन्न समाजों की गैरें निकली रही है, समूचा आलम रंगों में रंग जाने को मानो बेताब है। कलात्मक सुंदरता और जीवंत लोक-संस्कृति के कारण विश्वभर में ख्याति अर्जित कर चुकी स्वर्णनगरी में होली का पर्व हर बार की भांति इस बार भी धूमधाम से मनाने की पूरी तैयारी है।
एकादशी के दिन लक्ष्मीनाथ मंदिर में फाग खेलने के बाद पुष्करणा समाज की विभिन्न जातियों की गैरों ने होली की मस्ती को नगर भर में तारी कर दिया है। पिछले दिनों के दौरान गैरें अपने भाई-बंधुओं के मोहल्लों से बाहर निकल आती है तो गैरिए होली के रंग में रंगे नजर आए और होली के गीतों को गाकर पर्व की खुशी का इजहार किया।
फाग के गीतों में भक्ति
मरुप्रदेश के लोक जीवन में विभिन्न पर्वों, त्योहारों और मेलों की भांति होली पर गीत-संगीत की सरिता प्रवाहित होती है। फाग के गीतों में आमजन रम जाता है। लक्ष्मीनाथ मंदिर में सदियों से सूरदास, मीरा, चन्द्रसखी आदि कवियों के ब्रज और राजस्थानी में रचे हुए गीत गाए जाते हैं। ऐसा ही नजारा यहां बांकेबिहारी, मदनमोहनजी आदि वैष्णव मन्दिरों में भी देखने को मिलता है। रजवाड़ों के समय से शुरू हुई यह परम्परा आज भी बरकरार है।
सामूहिक गोठों से रिश्तों की मिठास
होली की पूर्व संध्या पर पुष्करणा ब्राह्मणों की परंपरागत गोठों का आयोजन हुआ। यह माना जाता है कि ऐसी सामूहिक गोठों से भाईचारा बढ़ता है, और आधुनिक जीवन की भागदौड़ में साथ बैठने का अवसर मिलता है। लोगों ने एक-दूसरे को होली की अग्रिम शुभकामनाएं दी। ऐतिहासिक गड़ीसर तालाब की पाल पर स्थित विभिन्न बगेचियों में शाम ढलते ही सैकड़ों स्त्री पुरुषों के साथ बच्चों ने इन सामूहिक गोठों में हर्षोल्लास के साथ शिरकत की। गड़ीसर तालाब की पाल पर पुरोहित, व्यास, बिस्सा व वृहतेश्वरियों की बगेचियों में सुबह से ही पकवान बनाने वाले रसोइयों के साथ व्यवस्थाओं में जुटे लोग पहुंच गए। गोठों के कारण गड़ीसर तालाब क्षेत्र में देर रात तक चहल-पहल रही।