गत कुछ वर्षों से कस्बे व ग्रामीण क्षेत्रों में तिल के तेल के लिए बैल व घाणियां नजर नहीं आते। अब उनकी जगह इलेक्ट्रिक मशीनों ने ले ली है।
गत कुछ वर्षों से कस्बे व ग्रामीण क्षेत्रों में तिल के तेल के लिए बैल व घाणियां नजर नहीं आते। अब उनकी जगह इलेक्ट्रिक मशीनों ने ले ली है। सर्दी के मौसम में तिल के तेल की मांग बढ़ रही है। ऐसे में कस्बे व गांवों में ऐसी इलेक्ट्रिक मशीनों से तेल निकालकर बेचा जा रहा है। जानकारी के अनुसार खिलजी वंशीय मुस्लिम तेली समाज के परिवार पीढिय़ों से परंपरागत रूप से तेल निकालने व बेचने का कार्य करते है। कुछ वर्ष पूर्व तक घाणी, जिसे कोल्हू भी कहते है, से तिल, सरसों, रायड़े आदि का तेल निकालने का कार्य करते देखा जा सकता था, लेकिन अब समय के बदलाव के साथ इलेक्ट्रिक मशीनों से तेल निकाला जा रहा है। खरीफ की तिलहन फसलों की बाजार में हो रही आवक के साथ सर्दी के मौसम में तिल के तेल की मांग व खपत बढ़ जाती है। कस्बे में खिलजी वंशीय तेली समाज के करीब 100 परिवार निवास करते है, जिनमें से कुछ परिवार पीढिय़ों से परंपरागत रूप से तिल, सरसों, रायड़े आदि से तेल निकालने का कार्य करते है, जो इस समाज के लोगों के लिए आय का मुख्य स्त्रोत भी है। तिलहनी फसलों की बंपर आवक होने पर इनका व्यवसाय भी तेजी पर रहता है। इस वर्ष क्षेत्र में अतिवृष्टि हुई थी। ऐसे में तिलहनी फसलों की अच्छी आवक होने के आसार है। तिल व मूंगफली की आवक शुरू भी हो चुकी है। जिससे इस रोजगार को जीवनदान मिल रहा है।
बड़े शहरों में वर्षों से विद्युत संचालित बड़ी-बड़ी तेल फैक्ट्रियों में प्रतिदिन हजारों लीटर तेल निकाला जाता है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ वर्ष पूर्व तक तेल की छोटी घाणियां चलती थी। लकड़ी की भारी भरकम घाणी बनाई जाती है। जिसके बीच में बड़ा छेद होता है और इस लकड़े की घाणी को करीब चार से पांच फीट तक जमीन में गाड़ दिया जाता है। जिसके ऊपर करीब सात-आठ फीट लकड़े की भारी भरकम माठ लगाई जाती है। जिसे कोल्हू भी कहते है। घाणी के उस छेद में तिल, सरसों या रायड़ा, मूंगफली आदि भरकर बेल की सहायता से उस कोल्हू से उसे पीसा जाता है। जिससे 15 किलो तिल, सरसों, रायड़े या मूंगफली से 6-7 किलो तक तेल निकल जाता है। इस शुद्ध तेल को किसान अपने घरेलू उपयोग में लेते है। कुछ वर्ष पूर्व तक घाणी से तेल निकालने का कार्य कर रहे एक तेली ने बताया कि 15 किलो तिलहन से तेल निकालने को एक घाणी कहते है। जिसकी मजदूरी 325 से 350 रुपए ली जाती थी। एक व्यक्ति दिनभर में दो व तीन घाणियां निकाल लेता था। जिससे उसे पर्याप्त रोजगार मिल जाता था।
कुछ वर्षों से लोग कोल्हू की बजाय इलेक्ट्रिक मशीनों का उपयोग करने लगे है। कस्बे के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी कई जगहोंं पर ऐसी मशीनें लगी देखी जा सकती है। इन मशीनों के माध्यम से ही तेल निकाला जाता है। विशेष रूप से सर्दी के मौसम में तिल के तेल की मांग अधिक है। ऐसे में खिलजी समाज से जुड़े लोग तिल का तेल निकालकर बेच रहे है। वर्तमान में तिल के तेल की एक लीटर की कीमत 360 रुपए ली जा रही है।