
Tanot Mata Temple (Patrika Photo)
Tanot Mata Mandir Jaisalmer: जैसलमेर: सरहद से महज 18 किलोमीटर पहले स्थित तनोट माता मंदिर आमजन और बीएसएफ जवानों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां हर दिन भक्त रुमाल बांधकर अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते हैं।
यह परंपरा केवल आम लोगों तक सीमित नहीं है, सीमा सुरक्षा बल के जवान भी नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते हैं। इतिहास में यह मंदिर कई घटनाओं का गवाह रहा है। साल 1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तान की गोलाबारी और बमबारी के बावजूद क्षेत्र सुरक्षित रहा।
मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन-मिसाइल हमले भी इस मंदिर और आसपास के इलाके को नहीं भेद सके। स्थानीय लोगों का मानना है कि तनोट माता जैसलमेर की रक्षा में सबसे बड़ी शक्ति हैं। मंदिर परिसर में रखे 450 जिंदा बम, बीएसएफ जवानों की श्रद्धा और विश्वास को दर्शाते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी युद्ध का जिक्र होता है, तो वीरता और शौर्य की गाथाएं जेहन में तैरने लगती हैं। लेकिन राजस्थान के रेतीले धोरों के बीच एक ऐसी कहानी भी दफन है, जो विज्ञान की समझ से परे और आस्था के अटूट विश्वास से जुड़ी है।
यह कहानी है जैसलमेर से 120 किलोमीटर दूर भारत-पाक सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर की, जिसे 'सैनिकों की देवी' और 'बम वाली माता' के नाम से भी जाना जाता है।
किस्सा शुरू होता है 16 नवंबर 1965 की काली रात से। पाकिस्तान की सेना ने भारतीय सीमा के भीतर घुसपैठ की नीयत से तनोट पोस्ट को निशाना बनाया। उस समय वहां महज 200 भारतीय सैनिक तैनात थे, जिनका संपर्क अपने मुख्यालय से टूट चुका था। स्थिति बेहद नाजुक थी, लेकिन कहा जाता है कि उसी रात माता तनोट ने सैनिकों के सपने में आकर उन्हें अभयदान दिया।
अगली सुबह, यानी 17 नवंबर को पाकिस्तानी सेना ने कहर बरपाना शुरू किया। मंदिर और सेना की पोस्ट को निशाना बनाकर करीब 3000 बम दागे गए। तनोट माता के मंदिर परिसर में ही करीब 450 बम गिरे, लेकिन चमत्कार ऐसा हुआ कि एक भी बम नहीं फटा। मंदिर की दीवारें और वहां मौजूद लोग पूरी तरह सुरक्षित रहे। माता के इस सुरक्षा चक्र ने भारतीय जवानों में ऐसा जोश भरा कि उन्होंने दुश्मन को सीमा पार भागने पर मजबूर कर दिया।
पाकिस्तान 1965 की हार को भुला नहीं पाया था। 1971 के युद्ध के दौरान उसने फिर से राजस्थान बॉर्डर को दहलाने की कोशिश की। इस बार निशाना थी 'लोंगेवाला पोस्ट'। पाकिस्तान की पूरी टैंक रेजिमेंट के सामने भारत के सिर्फ 120 वीर जवान खड़े थे। संख्या बल में कम होने के बावजूद, मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के नेतृत्व में जवानों ने मां तनोट का जयकारा लगाया और दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए।
इसी ऐतिहासिक जीत की याद में हर साल 16 दिसंबर को 'विजय दिवस' मनाया जाता है। मशहूर बॉलीवुड फिल्म 'बॉर्डर' की कहानी भी इसी लोंगेवाला की जंग और तनोट माता के चमत्कार पर आधारित है।
Published on:
05 Apr 2026 11:19 am
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