
जैसलमेर/लाठी. बच्चों के लिए माता-पिता केवल रिश्ते नहीं, बल्कि जीवन की सबसे सुरक्षित छांव होते हैं। उनके रहते भविष्य की चिंता कम लगती है, क्योंकि हर मुश्किल में सहारा देने वाले हाथ मौजूद रहते हैं। लेकिन बासनपीर के चार बच्चों से यह छांव एक ही हादसे में छिन गई। 14 अक्टूबर 2025 को हुए बस अग्निकांड में किसान आयुब खां और उनकी पत्नी बशीरा की मौत हो गई। एक साल बाद भी उनके बच्चों के जीवन में यह कमी ऐसी है, जिसे कोई भर नहीं सकता।
जैसलमेर मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर बासनपीर निवासी आयुब खां और बशीरा जैसलमेर कोऑपरेटिव बैंक के आवास ऋण की किस्त से जुड़े काम के लिए शहर गए थे। लौटते समय दोनों उसी निजी बस में सवार हुए, जिसमें आग लग गई। हादसे ने चार बच्चों को एक साथ माता-पिता के स्नेह और संरक्षण से वंचित कर दिया।
माता-पिता के जाने के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उनकी मौसी मदीना ने संभाली। परिवार के लिए यह केवल रहने और खाने की व्यवस्था का सवाल नहीं था, बल्कि उन बच्चों को भावनात्मक संबल देने की चुनौती भी थी, जिन्होंने अचानक अपने जीवन का सबसे बड़ा सहारा खो दिया।
बेटे अरबाज खां का कहना है कि माता-पिता को खोने का दुख शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। परिवार इस सदमे से कभी पूरी तरह बाहर नहीं आ पाएगा। इसके बावजूद बच्चे अपने माता-पिता के विचारों पर चलते हुए जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
बचपन में माता-पिता की मौजूदगी से मिलने वाला भरोसा जीवन के हर मोड़ पर काम आता है। पढ़ाई, परिवार और भविष्य से जुड़े फैसलों में उनका मार्गदर्शन बच्चों को दिशा देता है। आयुब खां और बशीरा के बच्चों को अब उन्हीं यादों के सहारे आगे बढ़ना है।
उनकी मौसी मदीना पर बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी है। चारों बच्चों के लिए माता-पिता की कमी किसी एक दिन या अवसर तक सीमित नहीं है। यह वह खालीपन है, जो रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-छोटे पलों में भी महसूस होता है।