
जैसलमेर. सडक़ पर दौड़ता कोई बस या ट्रक बाहर से बिल्कुल सामान्य दिख सकता है, लेकिन उसकी असली सुरक्षा ब्रेक, टायर, स्टीयरिंग, लाइटिंग और इंजन की तकनीकी स्थिति से तय होती है। इन्हीं मानकों की जांच के बाद फिटनेस प्रमाणपत्र मिलता है। जैसलमेर में यही बुनियादी सुरक्षा जांच स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं है।.नियमों में बदलाव के बाद परिवहन कार्यालय में व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस जांच बंद है। जिले में अधिकृत ऑटोमेटेड टेस्टिंग सेंटर यानी एटीएस भी नहीं है। नतीजा यह कि फिटनेस जांच के लिए वाहन को करीब 280 किलोमीटर दूर जोधपुर ले जाना पड़ता है। आने-जाने का फेरा करीब 560 किलोमीटर हो जाता है। यहीं से सडक़ सुरक्षा का बड़ा सवाल पैदा होता है—जब जांच इतनी दूर है तो क्या हर वाहन वास्तव में समय पर फिटनेस जांच करा रहा है?
व्यावसायिक वाहन रोजाना लंबी दूरी तय करते हैं। बसें यात्रियों और स्कूली बच्चों को लेकर चलती हैं, जबकि ट्रक और भारी वाहन लगातार माल ढोते हैं। ऐसे वाहनों में तकनीकी खराबी का जोखिम सामान्य निजी वाहनों से कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।
सडक़ पर जोखिम बढ़ाने वाली प्रमुख तकनीकी खामियां
घिसे या खराब टायर
कमजोर ब्रेक सिस्टम
स्टीयरिंग और सस्पेंशन में खराबी
विद्युत प्रणाली में गड़बड़ी
इंजन और ईंधन प्रणाली से जुड़ी तकनीकी समस्या
जैसलमेर से जोधपुर तक करीब 280 किलोमीटर की दूरी है। फिटनेस जांच के लिए वाहन को वहां ले जाकर वापस लाना पड़ता है। यानी करीब 560 किलोमीटर की यात्रा। भारी वाहन में इस दूरी पर करीब 8 हजार से 20 हजार रुपए तक डीजल खर्च होने का अनुमान है। टोल और चालक-परिचालक के दो दिन के भत्ते का खर्च अलग है। यहां आर्थिक बोझ से ज्यादा महत्वपूर्ण इसका संभावित असर है। यदि कोई वाहन मालिक खर्च और समय बचाने के लिए फिटनेस जांच टालता है, तो सडक़ पर दौड़ रहे वाहन की तकनीकी स्थिति विभाग की निगरानी से बाहर हो सकती है। यही सबसे बड़ा गैप है—फिटनेस प्रमाणपत्र की बाध्यता मौजूद है, लेकिन स्थानीय जांच सुविधा नहीं।
हाल में स्कूल बस में आग लगने की घटना ने वाहन सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी। बस में 17 बच्चे सवार थे। इंजन से धुआं उठते ही चालक ने बस रोककर बच्चों को बाहर निकाल लिया। समय रहते कार्रवाई से बड़ा हादसा टल गया। यह घटना फिटनेस प्रमाणपत्र की कमी का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसने एक जरूरी सवाल जरूर सामने रखा—स्कूल बसों और दूसरे व्यावसायिक वाहनों की तकनीकी सुरक्षा की निगरानी कितनी प्रभावी है?