कभी जैसलमेर के हर गांव-ढाणी में आम नजर आने वाले छप्पर अब बीते युग की बात बनते जा रहे हैं।
कभी जैसलमेर के हर गांव-ढाणी में आम नजर आने वाले छप्पर अब बीते युग की बात बनते जा रहे हैं। रेगिस्तानी जीवन की पहचान रहे ये छप्पर न केवल स्थानीय मौसम के अनुरूप थे, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और श्रम की मिसाल भी थे। लेकिन अब हालात ये हैं कि तेज गर्म हवाओं और कंक्रीट की चकाचौंध में यह संस्कृति दम तोड़ती नजर आ रही है।
छप्परों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे भीषण गर्मी में घर को ठंडा रखते थे और सर्दी में गर्माहट भी देते थे। स्थानीय बबूल, सांगरी, खेजड़ी और पलाश की लकडिय़ों से बने ये छप्पर पर्यावरण के अनुकूल होते थे, लेकिन अब उनकी जगह सीमेंट के मकानों ने ले ली है, जो ना केवल महंगे हैं, बल्कि गर्मी में ओवन की तरह तपते भी हैं।
छप्पर निर्माण एक विशिष्ट कला थी, जिसे कुछ ही समुदायों के लोग जानते थे। इन दिनों नए पीढ़ी के लोग यह काम छोड़ शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। इससे पारंपरिक छप्पर बनाने वाले कारीगर गिनती के रह गए हैं।
राजस्थानी लोकसंस्कृति विशेषज्ञ डॉ. भंवरदानसिंह रतनू कहते हैं कि छप्पर केवल आश्रय नहीं, बल्कि लोकज्ञान का प्रतीक थे। यह जलवायु के अनुसार बनाया गया एक अद्भुत समाधान था। कंक्रीट के मकान पर्यावरण और जेब - दोनों पर भारी पड़ते हैं। अगर समय रहते पारंपरिक तकनीकों को नहीं बचाया गया, तो यह धरोहर सदा के लिए खो जाएगी।
रामगढ़ क्षेत्र के वृद्ध किसान भूराराम बताते हैं कि हमारे जमाने में हर घर छप्पर से ढका होता था। आज तो गांव के बच्चे भी इसे देखकर हंसते हैं। कारीगर भी अब नहीं मिलते। मजबूरी में सीमेंट का घर बनवाया, लेकिन गर्मी में टिक पाना मुश्किल है।
दूसरी ओर नहरी क्षेत्र की गृहिणी अम्बूबाई कहती हैं कि छप्पर में ठंडी हवा चलती थी। अब मकान तो पक्के हैं, लेकिन मन चैन से नहीं रहता।
ग्रामीण विकास योजनाओं में छप्पर निर्माण को बढ़ावा देने या पारंपरिक कारीगरों को प्रोत्साहन देने की कोई नीति नहीं है। इससे यह परंपरा और तेजी से लुप्त हो रही है।