भारत-पाक सीमा से महज 5 किमी की दूरी पर स्थित करड़ा गांव देश की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन यहां के लोग अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
भारत-पाक सीमा से महज 5 किमी की दूरी पर स्थित करड़ा गांव देश की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन यहां के लोग अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और पशुपालन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की भारी कमी ने ग्रामीणों के जीवन को कठिन बना दिया है। सरहदी करड़ा गांव में पानी की समस्या सबसे गंभीर है। पीने के पानी के लिए ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। पर्याप्त नलकूप और जल टंकियां न होने से ग्रामीण पानी की किल्लत झेलने को मजबूर हैं। बारिश के पानी को सहेजने के प्रयास भी संसाधनों के अभाव में सफल नहीं हो पाते।
गांव में बिजली की आपूर्ति बेहद कमजोर है। जर्जर ट्रांसफार्मर और पुरानी बिजली लाइनें अक्सर खराब हो जाती हैं, जिनकी मरम्मत में कई दिन लग जाते हैं। बिना बिजली के लोगों की दिनचर्या प्रभावित होती है, बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है और ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी कठिन होती जा रही है।
गांव में स्वास्थ्य सेवाओं स्थिति संतोषजनक नहीं है। यहां केवल एक एएनएम के भरोसे आसपास के 10 गांवों की चिकित्सा व्यवस्था टिकी हुई है। यहां कोई डॉक्टर नहीं है, कोई दवाई उपलब्ध नहीं कराई जाती है। बीमार लोगों को इलाज के लिए जैसलमेर या अन्य शहरों तक जाना पड़ता है, जहां तक पहुंचना समय और पैसे दोनों की बर्बादी है।
करड़ा के लोग मुख्य रूप से पशुपालन पर निर्भर हैं। यहां करीब 5 हजार गोवंश और 15 हजार भेड़-बकरियां हैं। पशु चिकित्सा सेवाओं की कमी और प्रशासन की अनदेखी से पशुपालकों को नुकसान उठाना पड़ा। इसी तरह गांव में एकमात्र उच्च प्राथमिक विद्यालय है, जहां केवल दो शिक्षक कार्यरत हैं। यहां 100 से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। संसाधनों के अभाव में बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पा रही।
1965 और 1971 के युद्धों में करड़ा गांव के लोगों ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग दिया था। आज भी यहां के लोग सीमावर्ती सुरक्षा में अपनी भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन की उपेक्षा के कारण वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
सरहद की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले करड़ा जैसे गांवों के विकास की ओर ध्यान देना जरूरी है। सरकार को चाहिए कि सीमावर्ती गांवों को मुख्यधारा में लाने के लिए ठोस योजनाएं बनाए और वहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए। वरना देश की रक्षा करने वाले इन गांवों के लोग ही विकास की रोशनी से हमेशा दूर रह जाएंगे।
-लालूसिंह सोढ़ा, अधिवक्ता, जैसलमेर