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विख्यात मरु महोत्सव से जैसलमेर को मिली वैश्विक पहचान और पर्यटन-शक्ति

देश और दुनिया के पर्यटकों को जैसलमेर तक खींच लाने में जिस एक आयोजन ने सबसे अहम भूमिका निभाई है, वह मरु महोत्सव है। पिछली सदी में साल 1979 से शुरू हुआ इस पर्यटन-केंद्रित आयोजन ने जैसलमेर को देश-दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट स्थान दिलाया है।

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देश और दुनिया के पर्यटकों को जैसलमेर तक खींच लाने में जिस एक आयोजन ने सबसे अहम भूमिका निभाई है, वह मरु महोत्सव है। पिछली सदी में साल 1979 से शुरू हुआ इस पर्यटन-केंद्रित आयोजन ने जैसलमेर को देश-दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट स्थान दिलाया है। राजस्थान पर्यटन की धरोहर बन चुका यह महोत्सव बीते 48 वर्षों में केवल एक बार ही आयोजित नहीं हो पाया।

समय के साथ इस उत्सव ने न सिर्फ आकार बढ़ाया है, बल्कि इसकी आत्मा में भी नवाचार और आधुनिकता का समावेश हुआ है। गौरतलब है कि वर्ष 2001 में गुजरात के कच्छ-भुज क्षेत्र में आए भयावह भूकम्प के कारण मरु-महोत्सव का आयोजन निरस्त किया गया था। शुुरुआत में मरु महोत्सव चार दिन के लिए आयोजित होता था। कुछ सालों बाद इसकी अवधि को कम कर तीन दिन कर दिया गया। बीते कई दशकों तक यह माघ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक होता रहा। अब हालिया कुछ वर्षों से जैसलमेर के प्रवेश द्वार कहलाने वाले पोकरण में इसका एकदिनी आयोजन होने से यह चार दिवसीय हो गया है।

सैलानियों को खींचता है चुम्बकीय आकर्षण

मरु महोत्सव की लोक संस्कृति, परंपरागत वेशभूषा, ऊंट प्रतियोगिताएं, लोकनृत्य, संगीत और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटकों को आकर्षित करती है। यही कारण है कि यूरोप, अमेरिका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक से पर्यटक इस महोत्सव के दौरान जैसलमेर पहुंचते रहे हैं। बीते कुछ वर्षों के दौरान देशी सैलानियों के बीच धोरां धरती का यह आयोजन बहुत लोकप्रिय हो चुका है। राजस्थान के भी कोने-कोने से पर्यटक इसका लुत्फ उठाने के लिए पहुंचते हैं।

आजीविका का भी मजबूत आधार

जग विख्यात मरु महोत्सव ने जैसलमेर को पर्यटन-शक्ति के रूप में स्थापित किया है। होटल, रिसोर्ट, होम-स्टे, हस्तशिल्प विक्रेता, लोक कलाकार और परिवहन क्षेत्र सभी को इससे प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। यही कारण है कि यह उत्सव केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय आजीविका का मजबूत आधार भी बन गया है। महोत्सव के दौरान जिले में हजारों पर्यटकों की आवाजाही से रोजगार के अस्थायी और स्थायी अवसर सृजित होते हैं।

आधुनिकता की चमक-दमक

हाल के वर्षों में महोत्सव की शैली में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। पारंपरिक कार्यक्रमों और मरुश्री और मिस मूमल, साफा बांध आदि प्रतियोगिताओं के साथ अब सेलिब्रिटी नाइट्स, लाइट एंड साउंड शो, डिजिटल प्रमोशन, सोशल मीडिया लाइव स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन टिकटिंग जैसी तकनीकों का प्रयोग हो रहा है। खासतौर पर युवाओं में मरु महोत्सव को लेकर आकर्षण बढ़ा है। युवा वर्ग न केवल दर्शक बन रहा है, बल्कि आयोजन, प्रस्तुति और प्रचार में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

नवाचार में दिख रही भविष्य की पर्यटन सोच

नवाचारों ने महोत्सव को केवल अतीत की झलक तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे भविष्य की पर्यटन सोच से जोड़ा है। परंपरागत लोक कलाकारों के साथ आधुनिक मंच सज्जा, ड्रोन फोटोग्राफी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने मरु महोत्सव को नया कलेवर दिया है। मरु महोत्सव मौजूदा समय में जैसलमेर के लिए नया पर्यटन मॉडल तैयार कर रहा है, जहां संस्कृति संरक्षण और आधुनिक पर्यटन एक-दूसरे के पूरक बन रहे हैं।

फैक्ट फाइल -

  • 1979 में पहली बार हुआ मरु महोत्सव
  • 2001 में भूकम्प त्रासदी के कारण निरस्त हुआ आयोजन
  • 04 दिनों तक चलेगा आयोजन
  • 29 जनवरी से पोकरण में होगी शुरुआतएक्सपर्ट व्यू -महोत्सव की ऐतिहासिक विरासत47 साल से मरु महोत्सव का प्रतिवर्ष आयोजन किया जा रहा है। यह अपने आप में एक बड़ी विरासत बन चुका है। उक्त आयोजन जैसलमेर की पहचान, गौरव और वैश्विक ब्रांड बन चुका है। चार दिनों तक मरुस्थलीय जैसलमेर के अलग-अलग क्षेत्रों में सजने वाली यह सांस्कृतिक छटा न केवल पर्यटकों को आकर्षित करती है, बल्कि जैसलमेर को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मंच पर मजबूती से स्थापित भी कर रही है। आने वाले वर्षों में नवाचारों के साथ यह महोत्सव और अधिक व्यापक, समावेशी और वैश्विक स्वरूप लेने की पूरी संभावना रखता है।
  • कमलेश्वर सिंह, सहायक निदेशक, पर्यटक सहायता केंद्र, जैसलमेर
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