
रेत के अनंत विस्तार में जहां हर दिशा एक कहानी कहती है, वहीं जैसलमेर की पहाड़ियों में 'ठाळा' के रूप में शक्ति उपासना की अनूठी परंपरा आज भी जीवंत है। यहां देवी की मूर्ति नहीं, बल्कि उनके प्रतीकों की पूजा होती है—एक ऐसी आस्था, जो पीढ़ियों से बिना बदले चली आ रही है।
लोकमान्यता के अनुसार मामडजी ने संतान प्राप्ति के लिए हिंगलाज देवी की कठोर तपस्या की। सात दिनों की पदयात्रा और साधना से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें सात पुत्रियों और एक पुत्र का वरदान दिया।
सबसे पहले जन्मीं आवड़ माता, जिन्हें शक्ति का प्रमुख स्वरूप माना जाता है। उनके बाद जन्मीं छह बहनें आज भी अलग-अलग स्थानों पर शक्ति अवतार के रूप में पूजी जाती हैं। यही सातों बहनें जैसलमेर की ठाळा परंपरा' की आधारशिला हैं।
शहर से करीब 6 किमी दूर गजरूप सागर की पहाड़ी पर स्थित स्वांगिया माता मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
यहां लोग संकट के समय धोक लगाते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर पुनः दर्शन के लिए लौटते हैं। पहाड़ी की शांति में भक्तों को आत्मिक संतोष मिलता है।
भारत-पाक सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर लगभग 1200 वर्ष पुराना माना जाता है। सीमा सुरक्षा बल यहां की व्यवस्था संभालता है। सबसे अद्भुत तथ्य—भारत-पाक युद्ध के दौरान गिराए गए बम यहां फटे नहीं, जो आज भी मंदिर परिसर में सुरक्षित रखे हैं।
शहर से 20 किमी दूर स्थित तेमड़ेराय माता मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां देवी ने तेमड़ा नामक राक्षस का वध किया था।
विक्रम संवत 1432 में निर्मित यह मंदिर आज भी श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है।
देगराय माता मंदिर (50 किमी दूर) की मान्यता एक दैत्य वध से जुड़ी है, जिसके सिर को ‘देग’ बना दिया गया था। नवरात्र में यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है।
27 किमी दूर स्थित कालेडूंगराय माता मंदिर काले पत्थरों वाली पहाड़ी पर बना है।
चतुर्दशी और नवरात्र पर यहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं—सच्चे मन से मांगी हर मुराद पूरी होने की आस्था के साथ।
रेतीले धोरों के बीच स्थित भादरिया माता मंदिर सिर्फ धार्मिक ही नहीं, सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां 35 हजार गोवंश की विशाल गोशाला और एशिया के प्रमुख भूमिगत पुस्तकालयों में से एक मौजूद है।
नवरात्र में यहां विशाल मेले का आयोजन होता है।
मोहनगढ़ से 21 किमी दूर स्थित पनोधराराय माता मंदिर कभी दुर्गम माना जाता था।
1991 में जीर्णोद्धार के बाद यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए सहज सुलभ हो गया। परिसर में प्राचीन कुआं और देवी-देवताओं के चित्र इसकी ऐतिहासिकता को दर्शाते हैं।
Published on:
18 Mar 2026 08:28 pm
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