
जैसलमेर/लाठी. कुरजां के वार्षिक प्रवास ने लाठी क्षेत्र के तालाबों, खडीनों और कृषि क्षेत्रों को फिर प्रवासी पक्षियों की गतिविधियों से जोड़ दिया है। यहां हर वर्ष हजारों कुरजां पहुंचती हैं, लेकिन इनके संरक्षण के साथ प्रकृति आधारित पर्यटन को विकसित करने के लिए अभी व्यवस्थाओं का विस्तार जरूरी है। फलोदी के खींचन गांव में विकसित संरक्षण मॉडल लाठी के लिए एक उदाहरण के रूप में सामने आता है। वन्यजीव प्रेमी रणवीर सिंह भाटी के अनुसार लाठी से करीब 100 किलोमीटर दूर खींचन में कुरजां संरक्षण के लिए बेहतर व्यवस्थाएं विकसित की गई हैं। वहां हर वर्ष 10 से 15 हजार तक कुरजां प्रवास करती हैं।
पक्षियों के लिए नियमित चुग्गा, स्वच्छ पानी, उपचार और सुरक्षा के साथ पर्यटकों के लिए दर्शक स्थल उपलब्ध हैं। विद्युत लाइनों को भूमिगत करने की दिशा में भी काम हुआ है। इसके मुकाबले लाठी क्षेत्र के अधिकांश पड़ाव स्थलों पर ऐसी स्थायी व्यवस्थाएं नहीं हैं। खेतोलाई, लाठी, भादरिया, चाचा, धोलिया, डेलासर और लोहटा सहित कई गांवों के तालाब और खडीन कुरजां के पारंपरिक पड़ाव हैं। यहां खुले मैदान, जलस्रोत और कृषि क्षेत्र इन पक्षियों के प्रवास के लिए महत्वपूर्ण आधार बनते हैं। कुरजां की मौजूदगी का संबंध केवल जैव विविधता से नहीं है। प्रवासी पक्षियों के बड़े झुंडों को देखने के लिए पक्षी प्रेमियों की आवाजाही भी बढ़ती है। तालाबों के किनारे विचरण और खुले आसमान में सामूहिक उड़ान क्षेत्र के प्राकृतिक आकर्षण को बढ़ाती है। सुविधाएं विकसित होने पर यह प्रवास प्रकृति आधारित पर्यटन से भी जुड़ सकता है।
कुरजां का जैसलमेर की लोक संस्कृति में भी विशेष स्थान रहा है। इनके वार्षिक प्रवास और हजारों किलोमीटर की यात्रा से जुड़े लोकगीत और लोककथाएं स्थानीय लोकजीवन का हिस्सा हैं। हर वर्ष लंबी दूरी तय कर थार पहुंचने वाला यह पक्षी प्रकृति और प्रवास का प्रतीक भी माना जाता है।
पर्यावरण प्रेमी पार्थ जगाणी ने बताया कि कुरजां का प्रवास जैसलमेर के प्राकृतिक चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सितंबर से शुरू होने वाला यह प्रवास करीब छह महीने तक चलता है और मार्च के आसपास पक्षी वापस लौटते हैं। जलाशयों, खेतों और आसपास उपलब्ध भोजन के कारण लाठी क्षेत्र कुरजां के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव बना हुआ है। यदि प्रमुख पड़ाव स्थलों पर चुग्गा, पानी, सुरक्षा और उपचार की सुविधाएं विकसित होती हैं तो संरक्षण के साथ प्रकृति पर्यटन को भी आधार मिल सकता है। इससे लाठी क्षेत्र की जैव विविधता और कुरजां से जुड़ी स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को व्यापक मंच मिल सकता है।