जैसलमेर

खड़ीनों की धरती: काकनय नदी से सजीव होता कुलधरा

काक नदी का बहाव क्षेत्र व उसके केचमेंट क्षेत्र को देखा जाए तो यह विश्वास करना मुश्किल साबित होता है कि यह किसी रेगिस्तानी व सरहदी जिले का दृश्य है।

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Aug 08, 2024

काक नदी का बहाव क्षेत्र व उसके केचमेंट क्षेत्र को देखा जाए तो यह विश्वास करना मुश्किल साबित होता है कि यह किसी रेगिस्तानी व सरहदी जिले का दृश्य है। चारों तरफ फैली पहाडिय़ों से बहता हुआ पानी इस काक नदी को जीवंत बनाता है। काक नदी अपने साथ बहते पानी को संजोकर यहां के लोगों को जीने की राह दिखाती है। इतिहाकारों की मानें तो मरुस्थली क्षेत्र के जैसलमेर की गंगा नदी से काम नदी किसी भी लिहाज से कम नहीं है। मुख्य तौर पर काक नदी गांव भोपा, सोडा, कोटडी, गोरेरा, सत्ता, धउवा के पास बहती हुई 14 कोस की दूरी तय करते हुए गांव कुलधरा से पश्चिम में ढाई से 5 किलोमीटर खाभा बुझ में मिल जाती है।

काक ऋषि के कारण पड़ा नाम

इतिहावेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल बताते हैं कि काक नदी के बारे में बताया जाता है कि ब्रह्माजी के पुत्र काक ऋषि ने मरुस्थल में आकर जिस नदी के किनारे तपस्या की वह काकनयी नदी से जानी जाती हैं। मौजूदा समय में मूलसागर के मगरों से तीन कोस की दूरी से बारिश का पानी लुद्रवा के पास काकनय नदी में मिल जाता है। काकनी नदी या काक नदी, जिसे स्थानीय लोग इसे मसूरी नदी या काकनेय नदी के नाम से भी जानते है, जो कि जैसलमेर जिले की एक मौसमी नदी है। कोटड़ी गांव के दक्षिण में पहाडिय़ों में लगभग 27 किमी यानी 17 मील की दूरी पर निकलते हुए खाभा गांव के पास बुझ झील, जो करीब बीस वर्ग किमी क्षैत्र मे फैली है,उसमें गिरने से पहले कुछ किलोमीटर तक बहती है। जैसलमेर जैसे मरुस्थली क्षेत्र, जहां वर्षा सबसे कम होती है उसके लिए वरदान से कम नहीं हैं। काक नदी की तीन धारायें बताई गई है। एक धार कुलधर होकर बुझ झील में मिल जाती हैं। दूसरी धार काक नदी की गांव कुलधरा से पहले गांव काहला व लौद्रवा होकर रिण में मिल जाती है। तीसरी धार संवत 13 में जैसलमेर शहर से दक्षिण में तीन कोस की दूरी पर तत्कालीन राज परिवार की ओर से धन राशि खर्च कर निकाली गई। तीनों धाराएं आज भी मरूस्थल में पानी की आवश्यकता को पूरा करती है।

बनाए नौ विशाल खड़ीन

कुलधरा से करीब 20 किमी आगे बुझ झील जो बीस वर्ग किमी के विशाल क्षेत्र में फैली है। पालीवाल समाज के लोगों ने काक नदी के पानी को बुझ झील में खडीन रूपी बांधों में समेटकर नौ विशाल खड़ीन बनाए। हर ख ड़ीन मे पालीवाल जाति के किसान हजारों मन गेहूं, चने के बीज बोकर लाखों मण फसल की पैदावार लेते थे। सैकड़ों वर्ष पहले पालीवाल जाति के लोगों ने पानी के महत्व को समझा।

Updated on:
08 Aug 2024 08:16 pm
Published on:
08 Aug 2024 11:46 pm
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