जैसलमेर की स्वर्णिम रेत पर हर वर्ष होने वाला मरु-महोत्सव न केवल हमारे पारंपरिक कला रूपों को संजोता है, बल्कि देशी-विदेशी पर्यटकों और स्थानीय निवासियों को एक अद्भुत सांस्कृतिक संगम का अनुभव भी प्रदान करता है।
जैसलमेर की स्वर्णिम रेत पर हर वर्ष होने वाला मरु-महोत्सव न केवल हमारे पारंपरिक कला रूपों को संजोता है, बल्कि देशी-विदेशी पर्यटकों और स्थानीय निवासियों को एक अद्भुत सांस्कृतिक संगम का अनुभव भी प्रदान करता है। इस बार का मरु महोत्सव कुछ खास होगा, क्योंकि इसमें बड़े-बड़े सेलिब्रिटी कलाकारों की अनुपस्थिति में लोक कला के माध्यम से नए उत्साह का संचार करने की कवायद की जा रही है। आगामी 9 से 12 फरवरी तक होने वाले महोत्सव में जैसलमेर और पोकरण के रेतीले इलाकों में लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां महोत्सव की पहचान बनेंगी, जो शहर की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजते हुए एक नया रंग ले आएंगी। गौरतलब है कि पूर्व वर्षों में कैलाश खेर, मोहित चौहान, जावेद अली, लखविंदर वडाली जैसे नामचीन कलाकारों की धूम मचती थी। इस बार वे कलाकार मंच पर नजर नहीं आएंगे और ऐसे में सवाल उठता है कि क्या लोक कलाकार उन खाली स्थानों को भर पाएंगे? यह सवाल तो है, लेकिन हकीकत यह भी है कि यह कवायद एक नए बदलाव की ओर इशारा करता है। लोक कलाकारों की कला का परिष्कार और अनूठापन ही इस बार महोत्सव की चमक बनेंगे। जहां एक ओर प्रसिद्ध गायकों की अनुपस्थिति महसूस की जाएगी, वहीं दूसरी ओर हमारे पारंपरिक संगीत और नृत्य रूपों की महक इस महोत्सव में नई ऊर्जा का संचार करेगी। सूफी गायिका ज्योति नूरन, पंजाबी गायक काका और कबीर कैफे जैसे लोक कलाकार अब न केवल जैसलमेर, पोकरण और सम के स्थलों को रोशन करेंगे, बल्कि उन रास्तों की ओर भी हमें ले जाएंगे जहां हमारे लोकगीत और संस्कृति ने शाश्वत पहचान पाई है।
इस बार के आयोजन में एक विशेष बात यह है कि प्रशासन ने प्रचार-प्रसार में बहुत पहले से सक्रियता दिखाते हुए विशाल होर्डिंग्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स का सहारा लिया है। जिस कारण सैलानी पहले से इस महोत्सव की जानकारी पा रहे हैं और उनकी उत्सुकता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। प्रशासन का दावा है कि नए दृष्टिकोण के कारण इस बार जैसलमेर की संस्कृति और कला का प्रचार एक नई दिशा में बढ़ सकेगा।