
डिजिटल और सोशल मीडिया के तेज़ विस्तार के बावजूद रेडियो आज भी सीमावर्ती जिले की सशक्त और भरोसेमंद आवाज बना हुआ है। हर 13 फरवरी को मनाए जाने वाले रेडियो दिवस के अवसर पर यह तथ्य फिर सामने आता है कि रेडियो केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और प्रशासन के बीच सेतु की भूमिका निभा रहा है। सीमावर्ती जिलों में, जहां आज भी इंटरनेट और स्मार्ट तकनीक की पहुंच असमान है, वहां रेडियो की उपयोगिता और विश्वसनीयता बनी हुई है।
रेडियो ने शिक्षा, स्वास्थ्य, मौसम और सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारियों को वर्षों से आमजन तक सरल भाषा में पहुंचाया है। किसानों के लिए मौसम पूर्वानुमान, फसल सलाह, पशुपालन कार्यक्रम, वहीं महिलाओं और बच्चों के लिए स्वास्थ्य, पोषण और टीकाकरण जैसे विषय रेडियो के माध्यम से घर-घर पहुंचे हैं। सरकारी योजनाओं की जानकारी भी रेडियो के जरिए दूरस्थ गांवों तक पहुंची, जिससे योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सका।
इतिहास के पन्नों में झांकें तो 1962, 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान रेडियो ने देश और सीमावर्ती क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाई। उस समय रेडियो ही एकमात्र माध्यम था, जिसके जरिए युद्ध की स्थिति, सुरक्षा निर्देश और सरकारी संदेश तुरंत लोगों तक पहुंचे। आपदा के समय—चाहे वह प्राकृतिक हो या मानवीय—रेडियो ने हमेशा त्वरित और प्रामाणिक सूचना देकर लोगों को सतर्क किया। आपदा प्रबंधन में रेडियो की अहम भूमिका आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे सुलभ माध्यम माना जाता है। संस्कृति और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में भी रेडियो का योगदान उल्लेखनीय रहा है। लोकगीत, लोककथाएं, क्षेत्रीय बोलियां और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से रेडियो ने समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखा। सामुदायिक रेडियो ने स्थानीय मुद्दों, जनसमस्याओं और जनभागीदारी को मंच देकर लोकतांत्रिक संवाद को मजबूती दी है। ग्रामीण और शहरी—दोनों क्षेत्रों में रेडियो आज भी जनसंचार का प्रभावी माध्यम बना हुआ है।
भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत जून 1923 में रेडियो क्लब ऑफ़ बॉम्बे की ओर से की गई थी। इसके बाद 1927 में मुंबई और कलकत्ता में दो निजी ट्रांसमीटरों के साथ नियमित प्रसारण शुरू हुआ। इसे 1936 में ऑल इंडिया रेडियो के रूप में औपचारिक रूप दिया गया, जिसे 1957 में आधिकारिक तौर पर आकाशवाणी कहा जाने लगा।तकनीक के बदलते स्वरूप के बावजूद रेडियो की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। सीमावर्ती समाज के लिए रेडियो आज भी भरोसे का साथी बना हुआ है।
जनसंचार विशेषज्ञ ईश्वरदान कविया बताते हैं कि रेडियो की सबसे बड़ी ताकत उसकी पहुंच और विश्वसनीयता है। सीमावर्ती और आपदा-प्रवण क्षेत्रों में आज भी रेडियो सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद माध्यम है। डिजिटल युग में रेडियो ने खुद को ढाल लिया है, लेकिन उसकी आत्मा वही जनसंचार की सेवा है।
Updated on:
12 Feb 2026 08:53 pm
Published on:
12 Feb 2026 08:52 pm
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