
जैसलमेर. चुनावी पराजय के बाद तो कई नेता राजनीति को अलविदा कह जाते हैं लेकिन बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से 1957 में दूसरे सांसद बने जैसलमेर के महारावल रघुनाथसिंह संभवत: इकलौते उदाहरण होंगे, जिन्हें चुनाव जीतने के बाद राजनीति से अरुचि हो गई और वे बाद में कभी चुनावी समर में नहीं उतरे। 25 फरवरी से 12 मार्च 1957 की अवधि में राजस्थान में हुए देष के दूसरे आम चुनाव में बाड़मेर संसदीय क्षेत्र से रघुनाथसिंह ने निर्दलीय के तौर पर कांग्रेस के गोवर्धनदास बिनानी को सीधे मुकाबले में 27 हजार 616 मतों के अंतर से पराजित किया और संसद पहुंचे।
तीन जिलों में फैला था चुनाव क्षेत्र
दूसरे आम चुनाव में बाड़मेर संसदीय क्षेत्र की बात की जाए तो इसमें बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर तीन जिलों के क्षेत्र शामिल किए गए। पहले चुनाव में जहां बाड़मेर क्षेत्र में जालोर शामिल था, वहीं दूसरे चुनाव में जालोर को अलग कर जोधपुर जिले का शेरगढ़ क्षेत्र जोड़ा गया, जिसमें शेरगढ़ का समूचा तहसील क्षेत्र, फलोदी और ओसियां तहसील के कुछ गांवों के अलावा पूरा जैसलमेर जिला समाहित किया गया। इसी तरह बाड़मेर जिले की बात की जाए तो बाड़मेर, चौहटन, बालोतरा, सिवाना तथा गुड़ामालानी क्ष् ोत्रों के मतदाताओं ने चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी की।
सभी को देते थे सम्मान
महारावल रघुनाथसिंह के वाहन चालक और विशिष्ट सहयोगी रहे लाधूराम बल्लाणी ने बताया कि वे सभी को सम्मान देते थे और बहुत प्रेमपूर्वक व्यवहार करते थे। खुद मेयो कॉलेज अजमेर से पढ़े थे तथा शिक्षा विशेषकर बालिका शिक्षा पर भी उनका जोर रहता था। जब उन्होंने चुनाव लडऩे का निश्चय किया, तब उन्हें जैसलमेर से बाड़मेर ले जाने के लिए हजारों लोग ऊंटों के लश्कर के साथ यहां पहुंचे थे। वे संसद की बैठकों में भी पूरी तैयारी के साथ भाग लेते, लेकिन बाद में उन्हें राजनीति से निराशा हो गई और वे 1962 के बाद फिर कभी चुनावी राजनीति में नहीं उतरे। हालांकि उनके परिवार के सदस्य हुकुमसिंह 1957 और 1962 में लगातार दो बार जैसलमेर क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। उनकी परम्परा को रघुनाथसिंह के छोटे भ्राता चंद्रवीरसिंह ने भी आगे बढ़ाया तथा वे 1980 में जैसलमेर विधायक निर्वाचित हुए। पूर्व राजघराना के ही सदस्य डॉ. जितेंद्रसिंह भी 1990 में जैसलमेर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते।
धार्मिक प्रवृत्ति वाले थे सिंह
रघुनाथसिंह बेहद धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति थे। कालेडूंगरराय देवी के प्रति उनकी अगाध आस्था थी। जैसलमेर के वरिष्ठ नागरिक आज भी 1982 में उनके निधन का दिन याद रखे हुए है, जब जैसलमेर में तेज बारिश के साथ अपूर्व ओलावृष्टि हुई थी। जैसलमेर में पर्यटन को बढ़ावा देने में भी उनके योगदान को याद किया जाता है। यहां विख्यात फिल्मकार सत्यजीत रे की ‘सोनार किला’ और सुनील दत्त की क्लासिक ‘रेशमा और शेरा’फिल्म के निर्माण में उन्होंने पूरा सहयोग किया।
दूसरे चुनाव में मतदाताओं का गणित -
बाड़मेर -2,43,873
शेरगढ़ -1,01,837
जैसलमेर -60,380