
जैसलमेर. थार का रेगिस्तान लंबे समय से पर्यटन, संस्कृति और सामरिक महत्व के लिए जाना जाता है। अब रेगिस्तानी क्षेत्रों की उपयोगिता को नए नजरिये से देखा जा रहा है। खुला भूभाग, विस्तृत क्षितिज, कम जनसंख्या घनत्व और शहरों से दूर कई स्थानों पर अपेक्षाकृत कम कृत्रिम प्रकाश जैसी परिस्थितियां जैसलमेर को खगोलीय अवलोकन, भू-स्थानिक अध्ययन और रिमोट सेंसिंग से जुड़े शोध के लिए संभावनाशील क्षेत्र बनाती हैं। हालांकि वर्तमान में जैसलमेर में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का कोई स्पेस रिसर्च सेंटर या राष्ट्रीय खगोलीय वेधशाला स्थापित नहीं है। भारत सरकार की भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 ने निजी उद्योग, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की भागीदारी को नई गति दी है। इसके बाद भू-स्थानिक तकनीकों, पृथ्वी अवलोकन और उपग्रह डाटा के उपयोग का दायरा तेजी से बढ़ा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे समय में विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की वैज्ञानिक उपयोगिता का अध्ययन भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
खगोलीय अध्ययन के लिए साफ आकाश, विस्तृत क्षितिज और कम कृत्रिम प्रकाश महत्वपूर्ण कारक हैं। जैसलमेर शहर से दूर रेगिस्तानी क्षेत्रों में रात के समय प्रकाश प्रदूषण अपेक्षाकृत कम रहता है। शुष्क जलवायु के कारण वर्ष के बड़े हिस्से में साफ आकाश भी देखने को मिलता है। यही कारण है कि ऐसे क्षेत्रों को वैज्ञानिक अध्ययन के दृष्टिकोण से उपयोगी माना जाता है। गौरतलब है कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में रिमोट सेंसिंग उपग्रहों का उपयोग कृषि, जल संसाधन, मरुस्थलीकरण, वन, खनिज, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में किया जाता है। पश्चिमी राजस्थान का मरुस्थलीय भूभाग इन विषयों पर अध्ययन के लिए लंबे समय से उपयोग में आता रहा है। उपग्रह चित्रों के माध्यम से भूमि उपयोग परिवर्तन, वनस्पति, रेत के टीलों की गतिविधि और जल संसाधनों का विश्लेषण किया जाता है।
-विशाल रेगिस्तानी भूभाग
-कम जनसंख्या घनत्व
-विस्तृत खुला क्षितिज
-कई दूरस्थ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम प्रकाश प्रदूषण
-मरुस्थलीय पारिस्थितिकी का विशिष्ट स्वरूप
-सीमा क्षेत्र होने के कारण भू-स्थानिक अध्ययन की उपयोगिता
भारत की अंतरिक्ष नीति-2023 के बाद निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी है। कुछ संस्थाएं व निजी कंपनियों और स्टार्टअप को प्रोत्साहित कर रही हैं। हाल के वर्षों में देश में 300 से अधिक स्पेस स्टार्टअप सक्रिय हुए हैं। वैश्विक स्पेस इकोनॉमी भी लगातार विस्तार कर रही है, जिसमें पृथ्वी अवलोकन और भू-स्थानिक सेवाओं की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
-भू-स्थानिक अनुसंधान
-रिमोट सेंसिंग प्रशिक्षण
-विश्वविद्यालयों की फील्ड रिसर्च
-मरुस्थलीय पारिस्थितिकी अध्ययन
-जलवायु परिवर्तन अनुसंधान
-विज्ञान आधारित पर्यटन गतिविधियां
जैसलमेर का प्राकृतिक वातावरण देश के अन्य क्षेत्रों से अलग है। यदि वैज्ञानिक संस्थान इसकी भौगोलिक विशेषताओं का व्यवस्थित अध्ययन करें और सकारात्मक निष्कर्ष सामने आएं, तो पर्यटन के साथ विज्ञान एवं अनुसंधान आधारित गतिविधियों का भी विस्तार संभव है। इससे क्षेत्र की पहचान और स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ मिल सकता है।
-धीरज पुरोहित, पूर्व मरुश्री एवं पर्यटन विशेषज्ञ