जैसलमेर

jaisalmer: रक्षाबंधन पर पालीवालों की कलाई सूनी, 735 साल पुराना बलिदान आज भी जीवित

देशभर में रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम का पर्व है, लेकिन पालीवाल ब्राह्मण समाज के लिए यह दिन पूर्वजों के बलिदान और स्वाभिमान की स्मृति से जुड़ा है। करीब 735 वर्ष पहले श्रावणी पूर्णिमा की रात पाली से हजारों पालीवाल परिवारों के पलायन की घटना आज भी समाज की सामूहिक स्मृति में जीवित है। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में पालीवाल समाज रक्षाबंधन को पालीवाल एकता और बलिदान दिवस के रूप में भी याद करता है।
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Aug 28, 2026
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पालीवाल समाज के वीर बलिदानियों की याद में पाली शहर के बाहर बनाया गया पालीवाल धाम

जैसलमेर. देशभर में श्रावणी पूर्णिमा का पर्व रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम और रक्षा संकल्प के साथ मनाया जाता है, लेकिन पालीवाल ब्राह्मण समाज के लिए यह दिन पूर्वजों के बलिदान, शौर्य और स्वाभिमान की स्मृति से जुड़ा है। जैसलमेर के अनुसार करीब 735 वर्ष पहले विक्रम संवत 1347-1348 के दौर में श्रावणी पूर्णिमा की रात पाली के हजारों पालीवाल ब्राह्मण परिवारों ने नगर छोड़ दिया था। इसी घटना की स्मृति में समाज में रक्षाबंधन को लेकर अलग परंपरा बनी हुई है।

समृद्धि और सहयोग से पाली बना था संपन्न ब्राह्मणों का नगर

इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन पाली में बड़ी संख्या में पालीवाल ब्राह्मण परिवार निवास करते थे। समाज में परस्पर सहयोग की मजबूत परंपरा थी। बाहर से कोई ब्राह्मण परिवार पाली में बसता तो प्रत्येक परिवार उसे एक ईंट और एक चांदी का सिक्का देता था, ताकि नया परिवार आत्मनिर्भर बन सके। पालीवालों ने सुरक्षा के लिए राठौड़ वंश के संस्थापक राव सीहा की सहायता ली। परंपरा के अनुसार राव सीहा और उनके पुत्र आस्थान ने पालीवालों की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।

जलस्रोत अपवित्र करने की घटना बनी पाली छोड़ने का कारण

पालीवाल समाज की ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार 1291-92 ईस्वी के आसपास दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की सेना ने क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ाईं। पाली की समृद्धि की जानकारी मिलने पर आक्रमण हुआ। सीधे संघर्ष में सफलता नहीं मिलने पर आक्रमणकारियों ने पाली के प्रमुख जलस्रोत लोहड़ी तालाब में गोवंश के शव डाल दिए। इससे जल अपवित्र हो गया।

समाज की मान्यता के अनुसार इसके बाद पालीवालों ने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए केसरिया बाना धारण कर संघर्ष किया। भीषण युद्ध में हजारों लोग वीरगति को प्राप्त हुए। लोक परंपरा में युद्ध के बाद नौ मण जनेऊ और 84 मन चूड़े मिलने का उल्लेख है। इसी घटना की स्मृति में धौला चौतरा को महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है।

लोक में आज भी पंक्तियां कही जाती हैं—

' नौ मण तौल जनेऊ उतरी, चूड़ा मन चौरासी,

पाली का यह धौला चौतरा, है घटना का साक्षी।'

एक्सपर्ट व्यू: पूर्वजों का तर्पण करते हैं समाजजन

परंपरा के अनुसार नरसंहार के बाद श्रावणी पूर्णिमा की रात बचे हुए पालीवालों ने पाली छोड़ने का निर्णय लिया। लोकस्मृति में उनका संकल्प इस प्रकार मिलता है— 'पालीवाल सब प्रण धरयो, गऊ रगत री आण। राखी पूनम रोप गधोत्तर, पाली त्यागण प्रमाण॥'

पाली छोड़ने के बाद आदि गौड़ वंशीय ये ब्राह्मण पालीवाल कहलाए। इनके परिवार गुजरात और पश्चिमी राजस्थान, विशेषकर जैसलमेर-पोकरण क्षेत्र में जाकर बसे। आज भी रक्षाबंधन पर पालीवाल समाज के लोग पाली में मानपुरा भाकरी स्थित रुक्मिणी मंदिर और धौला चौतरा पर एकत्र होते हैं। यहां पूर्वजों, वीर हुतात्माओं और सती माताओं को तर्पण कर श्रद्धांजलि दी जाती है। पूनागर माता भाखरी के समीप पालीवाल धाम का निर्माण भी कराया गया है।

- ऋषिदत्त पालीवाल, इतिहासवेत्ता

Updated on:
28 Aug 2026 08:53 pm
Published on:
28 Aug 2026 08:53 pm