जैसलमेर

घटा खादी में रोजगार तो सिमटा उत्पादन भी, जैसाण में 10 फीसदी ही लोग ही अब जुड़े रह गए

सिमटने के कगार पर खादी... -जिम्मेदारों की नीतियों व व्यावसायिक तकाजों से बनी स्थिति -जैसाण में 10 फीसदी ही लोग ही अब जुड़े रह गए खादी में
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Oct 03, 2018
jaisalmer
घटा खादी में रोजगार तो सिमटा उत्पादन भी, जैसाण में 10 फीसदी ही लोग ही अब जुड़े रह गए

जैसलमेर. महात्मा गांधी ने जिस खादी को हथियार बनाकर विदेशी शासन की चूलें हिला दी थी, आजाद भारत में आज वह सिमटने के कगार पर पहुंच गई है। गांधी के नाम को भुनाने में कभी पीछे नहीं रहने वाली सरकारें, चाहे वह किसी भी दल की हो, पिछले कई वर्षों से खादी उत्पादों व उन्हें बनाने वाले कामगारों की जमकर उपेक्षा करने में जुटे हैं। सीमावर्ती जैसलमेर जिले में खादी से जुड़े कामगारों की तादाद घटकर 10 फीसदी तक ही रह गई है। आधुनिकता और कम्प्यूटरीकरण की मुरीद सरकारों ने अव्यावहारिक ढंग से नीतियां बनाकर रही सही कसर पूरी कर दी।
जानकारी के अनुसार जैसलमेर जिले में किसी जमाने में 10 हजार कतिनें हुआ करती थीं जो घर पर बैठकर चरखा चलाकर अपने परिवार की जरूरतें पूरी करते हुए खादी को सम्बल प्रदान किया करतीं। आज उनकी तादाद घटकर 1000-1100 तक ही रह गई है। ऐसे ही बुनकरों की संख्या 500 तक पहुंची हुई थी और आज वे बमुश्किल 50 का आंकड़ा छूते हैं। औद्योगीकरण के अंधड़ में पूर्णतया हस्तनिर्मित खादी उत्पाद तूफान में फडफड़़ाते दीये के जैसे नजर आते हैं। कताई-बुनाई से लेकर रंगाई-छपाई तक का काम हाथ से ही होने के कारण इसकी लागत बढ़ जाती है, इससे बाजार में उसका टिकना संभव नहीं है। खादी को सबसे बड़ा आसरा खरीदारों को मिलने वाली सरकारी सब्सिडी का ही रहता आया है। कभी यह 25, 35 और 50 प्रतिशत तक हुआ करती थी और आज सरकारी उपेक्षा के चलते महज 5 प्रतिशत ही रह गई है। खादी संस्थाएं अपनी ओर से 10 प्रतिशत सब्सिडी दे रही हैं फिर भी यह आम खरीदारों के लिए महंगी ही पड़ती है।
मेहनत ज्यादा, कमाई कम
खादी के कार्य में मेहनत ज्यादा होने तथा मजदूरी कम मिलने से भी नई पीढ़ी इससे जुडऩा नहीं चाहती। जिन परिवारों में यह कार्य पीढिय़ों से चल रहा था, वे अब रोजगार के दूसरे ठिकानों की तरफ मुड़ रहे हैं। उस पर सरकार ने कतिनों तक को कम्प्यूटरीकरण और बैंकिंग के बेवजह के झमेलों में फंसा दिया है। जैसलमेर जैसे सीमावर्ती तथा विशाल क्षेत्रफल वाले जिले में कम्प्यूटर तथा बैंकिंग व्यवस्था की पहुंच अब तक सीमित है।

जैसलमेर के उत्पाद हैं उत्कृष्ट
खादी की बात की जाए तो मरुस्थलीय जैसलमेर जिले में अधिकतर ऊन की कताई-बुनाई का काम होता है। यहां खादी से जुड़ी 5 संस्थाएं सुचारू रूप से काम कर रही हैं। यहां कोट, जैकेट, शॉल, पट्टू, कम्बल सहित अन्य ऊनी उत्पाद तैयार होते हैं। इन ऊनी कपड़ों में सर्दी का मुकाबला करने की क्षमता खूब होती है। यह और बात है कि मानव श्रम से तैयार होने वाली खादी को विशाल पूंजी वाली फैक्ट्रियों से बनने वाले माल से टक्कर लेने के लिए सरकारों ने छोडकऱ एक तरह से उसे इतिहास की वस्तु बनाने की भूमिका तैयार कर दी है। जानकारी के अनुसार जिले में बीते वर्षों के दौरान खादी का सालाना ऊनी का उत्पादन 2 करोड़ था जो अब लागत बढऩे के बावजूद 1.25 करोड़ पर अटक गया है। जानकारों का सुझाव है कि खादी को जिंदा रखने के लिए कताई और बुनाई के कार्य को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से जोड़ा जाए तो लोगों को न्यूनतम मजदूरी मिल पाएगी। वहीं उत्पाद सस्ते होने से वे खुले बाजार के प्रतियोगी बाजार में टिक सकेंगे।

फैक्ट फाइल -
- 10 प्रतिशत लोग ही जुड़े रह गए खादी से
- 1.25 करोड़ का सालाना व्यवसाय
- 05 संस्थाएं जिले में कार्यरत

चुनौतियों से रु-ब-रु खादी खादी
मौजूदा समय में खादी को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों को इसे रोजगारपरक बनाने के लिए जरूरी सहायता प्रदान करनी ही चाहिए। लोगों को भी खादी से जुड़े पवित्र भाव को जेहन में रखना होगा।
- राजूराम प्रजापत, मंत्री, खादी परिषद जैसलमेर

Published on:
03 Oct 2018 07:45 am