जैसलमेर

गोलियां और सिरप: इलाज के नाम पर खामोशी से फैलता नशा

यह नशा न तो गलियों में खुलेआम बिकता दिखता है, न ही इसकी गंध शराब जैसी पहचान देती है। यह खामोशी से घरों में प्रवेश करता है, स्कूल-कॉलेज की दहलीज लांघता है और किशोर उम्र को अपराध की ओर धकेल रहा है।

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Jan 05, 2026

दवा… तो बीमारी से राहत देती है, लेकिन अब चिंताजनक बात यह है कि गोलियां और कफ सिरप अब नशे का आसान रास्ता बन चुकी हैं। यह नशा न तो गलियों में खुलेआम बिकता दिखता है, न ही इसकी गंध शराब जैसी पहचान देती है। यह खामोशी से घरों में प्रवेश करता है, स्कूल-कॉलेज की दहलीज लांघता है और किशोर उम्र को अपराध की ओर धकेल रहा है। दर्द निवारक टैबलेट, खांसी के सिरप, नींद की गोलियां—इन सबका उपयोग अब बीमारी के लिए नहीं, बल्कि ' हाई ' पाने के लिए किया जा रहा है। मेडिकल शब्दों की आड़ में यह नशा वैध दिखता है और हकीकत यह भी है कि इन दवाओं को समाज नशा मानने को तैयार ही नहीं। यही वजह है कि रोक-टोक, निगरानी और संवाद तीनों ही कमजोर पड़ जाते हैं।

किशोर उम्र, पहली गिरफ्तस्कूल और कॉलेज जाने की उम्र में बच्चे इस नशे की चपेट में आ रहे हैं। पहले दोस्तों के दबाव में 'ट्रायल', फिर आदत और उसके बाद निर्भरता। नशे की पूर्ति के लिए चोरी, झपटमारी और छोटे-मोटे अपराध शुरू हो जाते हैं। अपराध की दुनिया में पहला कदम अक्सर इन्हीं गोलियों और सिरप से पड़ता है। पुलिस रिकॉर्ड में कई मामलों में आरोपी की उम्र 18- 22 वर्ष के बीच मिलती है—एक ऐसी उम्र, जहां भविष्य बनना चाहिए, बिगड़ नहीं।आसान उपलब्धता, बड़ी समस्या

मेडिकल स्टोर से बिना पर्ची मिलने वाली दवाएं इस संकट की जड़ हैं। कई जगहों पर एक ही व्यक्ति अलग-अलग दुकानों से सीमित मात्रा में दवा लेकर बड़ी खपत पूरी कर लेता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह और भी आसान है, जहां निगरानी तंत्र कमजोर है। सिरप को शीतल पेय में मिलाकर पीना या गोलियों को क्रश कर सेवन करना अब 'ट्रेंड' बन चुका है, जिसकी जानकारी अभिभावकों तक देर से पहुंचती है।

परिवार को नहीं होती भनक

यह नशा इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि इसकी पहचान कठिन है। न धुआं, न शराब की गंध, न लड़खड़ाहट। बच्चे सामान्य दिखते हैं, लेकिन व्यवहार बदलने लगता है—चिड़चिड़ापन, एकांतप्रियता, पैसे की मांग, पढ़ाई से दूरी, नींद का बिगड़ता चक्र। अक्सर अभिभावक इसे उम्र का असर या मोबाइल की लत समझकर अनदेखा कर देते हैं। जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक लत गहरी हो चुकी होती है।

स्वास्थ्य पर सीधा हमलाइन दवाओं का अनियंत्रित सेवन दिमाग, लीवर और किडनी पर गंभीर असर डालता है। याददाश्त कमजोर होना, अवसाद, आक्रामकता और आत्मघाती प्रवृत्ति तक देखने को मिल रही है। लंबे समय तक सेवन से शरीर की प्राकृतिक क्षमता खत्म होने लगती है। कई मामलों में ओवरडोज जानलेवा साबित हुआ है, लेकिन शर्म और डर के कारण परिजन सच्चाई छिपा लेते हैं।

कानून और व्यवस्था की चुनौती। दवाएं वैध हैं, लेकिन उनका दुरुपयोग अवैध। इसी ग्रे ज़ोन में यह कारोबार फल-फूल रहा है।

खुला संवाद जरूरीस्कूलों में नियमित काउंसलिंग, अभिभावकों के लिए जागरूकता सत्र और युवाओं से खुला संवाद जरूरी है। सबसे अहम है—नशे की परिभाषा बदलने की सामाजिक सोच। जब तक गोलियों और सिरप को 'नशा' मानकर स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक लड़ाई अधूरी रहेगी।

Published on:
05 Jan 2026 11:19 pm
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