मुश्किलों से सिर झुकाना है मना, हार कर आंसू बहाना है मना.... -सरला यादव को विश्वकप में श्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद
जैसलमेर. मुश्किलों से सिर झुकाना है मना, हार कर आंसू बहाना है मना, कौनसी रात है जो कटती नहीं, कौनसी बात है जो बनती है.. मलेशिया में आयोजित एशियन गेम्स में एथलेटिक्स में स्वर्णपदक जीतने के विश्वकप की तैयारी में जुटी सरला यादव एक बार फिर मलेशिया में देश का परचम फहराने को आतुर है। राजस्थान पत्रिका से खास बातचीत में सरला ने बताया कि मलेशिया में आयोजित एशियन गेम्स में उन्होंने भाग लिया था। आगामी विश्वकप की तैयारी के लिए पुन एक बार मलेशिया में होने वाले अभ्यास प्रशिक्षण में भाग लेना होगा। सरला का ससुराल राजस्थान के अलवर जिले में है। उन्होंने बताया कि बचपन से ही खेलों के प्रति उनका खास लगाव रहा है। विद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने कई खेल प्रतियोगिताओं व शारीरिक गतिविधियों में भागीदारी निभाई। पेशे से अध्यापिका सरला ने बताया कि वह विद्यार्थियों को भी पढ़ाई के साथ-साथ शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करती है। वे वर्तमान में सरदारसिंह की ढाणी स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में कार्यरत है। सरला ने बताया कि मलेशिया में आयोजित एशियन गेम्स में 400 मीटर बाधा दौड़ प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्णपदक हासिल किया। मूलत: हरियाणा के महेंद्रगढ़ निवासी सरला यादव इससे पूर्व राज्य स्तर पर 3 स्वर्ण पदक, राष्ट्रीय स्तर पर 2 स्वर्ण व 1 रजत व दिल्ली में भारत-बांग्लादेश प्रतिस्पर्धा में 1 स्वर्ण पदक हासिल कर चुकी है।
जहां चाह, वहीं राह
खिलाड़ी, गृहणी व सरकारी सेवा, तीनों ही रूप में समायोजन के बारे में सरला का कहना है कि जहां चाह हो वहीं राह मिल जाती है। वे शारीरिक शिक्षिका होने के कारण नियमित शारीरिक व्यायाम से जुड़ी हुई है। सप्ताह में एक दिन अवकाश के दौरान वे बच्चों से मिलने जाती है और उनकी पढ़ाई को लेकर काफी जागरुक है। उन्होंने बताया कि हेल्थ इज वेल्थ, उनके जीवन का मूलमंत्र है। दूध, दही, घी, खीर व ड्राई फू्रट को आहार के रूप में लेती है।
सोशल मीडिया में अपडेट
सरला के अनुसार व्यस्त समय में भी वे सोशल मीडिया में अपडेट रहती है। पूर्व खिलाड़ी व केन्द्रीय मंत्री राज्यवद्र्धनसिंह के बनाए सोशल मीडिया गुु्रप में वे शामिल है और खेल से जुड़ी हर गतिविधि की उन्हें इस गु्रप में जानकारी मिलती रहती है। उन्होंने कहा कि फिल्म देखने का उन्हें शौक नहीं है, इसलिए उन्हें याद नहीं कि वे अंतिम बार फिल्म देखने कब गई।
बचपन की घटना ने दी दिशा
उन्होंने बताया कि बचपन में एक बार वे पिता से मिलने चार किमी दूर दौड़ कर चली गई थी, इस कारण उन्हें मम्मी से काफी डांट भी पड़ी थी। जब यह बात उनके पिता को पता चली तो वे उन्होंने सकारात्मक तरीके से सोचा कि चार किमी तेज दौडऩे वाली उनकी बेटी को सही प्रशिक्षण मिले तो वे देश के लिए उपलब्धि हासिल कर सकेगी। इस घटना ने उनके जीवन को नई दिशा दी।