जैसलमेर

तनोट माता : जिसके चमत्कार के आगे नतमस्तक हो गया था पाकिस्तानी सेना का ब्रिगेडियर

यह मंदिर है ही इतना चमत्कारिक कि यहां पर पाकिस्तान सेना का ब्रिगेडियर भी नतमस्तक हो गया था। वर्ष 1965 में हुए भारत-पाक युद्ध में तनोट माता के चमत्कारों से प्रभावित पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने भारत सरकार से यहां दर्शन करने की अनुमति देने का अनुरोध किया था और करीब ढाई साल बाद जब उन्हें भारत सरकार से अनुमति मिली तब ब्रिगेडियर ने न केवल माता की प्रतिमा के दर्शन किए बल्कि मंदिर में चांदी का एक सुंदर छत्र चढ़ाया।

2 min read
Oct 02, 2024

भारत-पाकिस्तान सीमा पर अवस्थित और जिला मुख्यालय से 120 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित तनोट माता का मंदिर मौजूदा समय में देश भर के श्रद्धालुओं की आस्था व श्रद्धा का स्थान बन चुका है। वर्ष में दो बार चैत्र और शारदीय नवरात्रा पक्ष के मौके पर तो मंदिर में कई बार इतनी भीड़ होती है कि पांव रखने को जगह नहीं मिलती। यह मंदिर है ही इतना चमत्कारिक कि यहां पर पाकिस्तान सेना का ब्रिगेडियर भी नतमस्तक हो गया था। वर्ष 1965 में हुए भारत-पाक युद्ध में तनोट माता के चमत्कारों से प्रभावित पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने भारत सरकार से यहां दर्शन करने की अनुमति देने का अनुरोध किया था और करीब ढाई साल बाद जब उन्हें भारत सरकार से अनुमति मिली तब ब्रिगेडियर ने न केवल माता की प्रतिमा के दर्शन किए बल्कि मंदिर में चांदी का एक सुंदर छत्र चढ़ाया। ब्रिगेडियर खान का चढ़ाया हुआ छत्र आज भी इस घटना का गवाह बना हुआ है।

1200 वर्ष प्राचीन मंदिर
तनोट माता का यह मंदिर 1200 वर्ष प्राचीन माना जाता है। तनोट को भाटी राजपूत राव तनुजी ने बसाया था और यहां पर ताना माता का मंदिर बनवाया था, जो वर्तमान में तनोटराय मातेश्वरी के नाम से जाना जाता है। मंदिर की पूजा-अर्चना सहित सारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं का जिम्मा सीमा सुरक्षा बल ही संभालता है। उसके जवानों की इस मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा है। नवरात्रि के मौके पर तनोट मंदिर में आस्था का ज्वार उमड़ता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शनार्थ पहुंचते हैं और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं। हर दिन दोपहर 12 बजे व शाम 7 बजे आरती की जाती है। मंदिर में होने वाली तीनों आरतियों में अद्भुत समां बंध जाता है। विशिष्ट शैली में यहां सीसुब के जवानों द्वारा की जाने वाली आरती में शामिल होने के लिए भक्तजन लालायित रहते हैं।

युद्धों से बढ़ी ख्याति
भारत-पाकिस्तान के 1965 व 1971 के युद्धों के बाद मंदिर ने विशेष ख्याति बढ़ी है। पाक सीमा से सटे जैसलमेर में दुश्मन ने बम बरसाकर लोगों को दहशत में डालने और नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन युद्ध में मंदिर के आसपास करीब 3000 बम बरसाए और करीब साढ़े चार सौ गोले मंदिर परिसर में गिरे लेकिन ये बम फटे ही नहीं। ये बम आज भी मंदिर परिसर में मौजूद हैं। तनोट माता को रुमाल वाली देवी के नाम से भी जाना जाता है। माता तनोट के प्रति प्रगाढ़ आस्था रखने वाले भक्त मंदिर में रुमाल बांधकर मन्नत मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु माता का आभार व्यक्त करने वापस दर्शनार्थ आते हैं और रुमाल खोलते हैं। यह मान्यता भी कई सालों से चल रही है। इस परम्परा का आम लोगों के साथ माता के दर्शनार्थ तनोट आने वाले अति विशिष्ट अतिथि, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी, सेना व सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी व जवान भी निर्वहन करते हैं।

Published on:
02 Oct 2024 10:13 pm
Also Read
View All

अगली खबर