
जैसलमेर. एक नवजात के जीवन का सबसे निर्णायक समय कोई दिन, सप्ताह या महीना नहीं, बल्कि जन्म के बाद के पहले 60 मिनट होते हैं। चिकित्सा विज्ञान इन्हें गोल्डन ऑवर कहता है। इस दौरान मां का पहला पीला गाढ़ा दूध—कोलोस्ट्रम—बच्चे की पहली प्राकृतिक वैक्सीन बनकर शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता की नींव रखता है। जैसलमेर में सुरक्षित प्रसव की दिशा में तस्वीर बदली है। इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसा अंतर अब भी मौजूद है, जो किसी भी नवजात के भविष्य को प्रभावित कर सकता है—हर बच्चे को जन्म के पहले घंटे में स्तनपान अभी भी सुनिश्चित नहीं हो पा रहा। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार राजस्थान में जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू कराने की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। संस्थागत प्रसव का प्रतिशत भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। इसके बावजूद लक्ष्य अभी शत-प्रतिशत से दूर है।
कुछ वर्ष पहले तक चुनौती गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाने की थी। आज चुनौती बदल चुकी है। अब प्रश्न यह नहीं कि प्रसव कहां हुआ, बल्कि यह है कि प्रसव के कितनी देर बाद नवजात ने पहला दूध पिया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित प्रसव तभी पूर्ण माना जाएगा, जब प्रसव के तुरंत बाद मां और शिशु का संपर्क हो तथा पहले घंटे में स्तनपान शुरू हो।
-सिजेरियन प्रसव के बाद अनावश्यक विलंब।
-नवजात को तुरंत अलग वार्ड ले जाना।
-परिवार की पारंपरिक मान्यताएं।
-शहद, घुट्टी या मीठा पहले देने की गलत परंपरा।
-स्तनपान परामर्श की सीमित व्यवस्था।
- प्रसव कक्ष में प्रशिक्षित सहयोग का अभाव।
जैसलमेर की चुनौती बाकी जिलों से अलग क्यों?
- कई गांव जिला मुख्यालय से 100–200 किलोमीटर दूर
- ढाणियों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच चुनौतीपूर्ण
- प्रसव के बाद विशेषज्ञ परामर्श हर जगह उपलब्ध नहीं
- पारिवारिक निर्णयों में बुजुर्गों की भूमिका अधिक
- स्वास्थ्यकर्मियों की नियमित काउंसलिंग हर क्षेत्र तक नहीं पहुंच पाती
जन्म के पहले घंटे में मां का पहला दूध किसी दवा का विकल्प नहीं, बल्कि प्रकृति का सबसे प्रभावी सुरक्षा कवच है। इसमें सभी रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है। शिशु में इसके सेवन से एंटीबॉडी बनती है। यदि यह समय निकल जाता है तो नवजात कई स्वास्थ्य लाभों से वंचित हो सकता है।
- डाॅ राजेन्द्र कुमार पालीवाल, सीएमएचओ, जैसलमेर