- जिम्मेदार बने हुए हैं बेपरवाह
जैसलमेर। स्वर्णनगरी जैसलमेर में जगह-जगह डेयरी की केबिनें रखकर बेशकीमती जमीनों पर बेतहाशा कब्जे बढ़ रहे हैं। नगरपरिषद के सभापति की तरफ से पिछले दिनों इस संबंध में जिला प्रशासन को पत्र लिखने और यह मामला जिला सतर्कता समिति की बैठक में भी जोर-शोर से उठाए जाने के बावजूद आम रास्तों पर केबिनें रखे जाने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। इस बीच इक्का-दुक्का केबिनों को मुख्य स्थलों से हटाकर थोड़ा पास के इलाके में खिसकाया गया है। इसके बावजूद ज्यादातर केबिनें आम रास्तों व अहम स्थलों पर काबिज है।
दूध की कितनी खपत
जानकारी के अनुसार एक सहकारी दूध डेयरी से संबंधित केबिनों का आवंटन पिछले दिनों से किया जा रहा है। बताया जाता है कि डेयरी की तरफ से तो ढाई सौ केबिनें लगाए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इतनी केबिनें लगने के बाद तो शहर में चलने को भी शायद जगह नहीं बचेगी। इसके तहत पिछले महीनों के दौरान करीब 40 केबिनें यहां-वहां रखी जा चुकी हंै। यह केबिनें प्रशासन आवंटित करता है। इससे पहले नगरपरिषद के तकनीकी अधिकारी केबिन रखे जाने वाले स्थान के संबंध में रिपोर्ट देता है। जानकारी के अनुसार उक्त कार्मिक मनमाने ढंग से संबंधित व्यक्ति के पक्ष रिपोर्ट बनाकर सौंप देते हैं। इसके आधार पर प्रशासन डेयरी के बूथ के तौर पर केबिन लगाने को मंजूरी दे देता है। सोचने वाली बात यह है कि आखिर छोटे-से शहर जैसलमेर में डेयरी के दूध की कितनी खपत है? जबकि वास्तविकता यह है कि इन दूध के बूथों में से अधिकांश में नाममात्र के दूध की बिक्री होती है और अन्य वस्तुओं का विक्रय किया जाता है। एक कमरे के आकार की केबिनों से यातायात व्यवस्था बाधित होने के साथ शहर के सौन्दर्य के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है।
इस संबंध में पिछले अर्से नगरपरिषद के सभापति हरिवल्लभ कल्ला ने स्वयं कड़ी आपत्ति जताते हुए जिला प्रशासन से अनेक महत्वपूर्ण स्थलों से दूध की इन केबिनों को हटवाए जाने को लेकर पत्र लिखकर मांग की थी। यह मामला इसके बाद सतर्कता समिति की बैठक में भी उठा। इसके बावजूद जिला प्रशासन व नगरपरिषद के जिम्मेदारों की तरफ से मामले को हल्के में लिया जा रहा है।