रेगिस्तान की रेत उस रात दहक रही थी। दिसंबर की सर्द हवाएं कंपकंपा रही थीं, लेकिन जैसलमेर की सरहद पर खड़े थे 120 भारतीय जवान — जिनके इरादे बर्फ से कहीं ज़्यादा ठोस और आग से कहीं ज़्यादा प्रचंड थे।
रेगिस्तान की रेत उस रात दहक रही थी। दिसंबर की सर्द हवाएं कंपकंपा रही थीं, लेकिन जैसलमेर की सरहद पर खड़े थे 120 भारतीय जवान — जिनके इरादे बर्फ से कहीं ज़्यादा ठोस और आग से कहीं ज़्यादा प्रचंड थे। उनके सामने थे पाकिस्तान के 2000 से अधिक सैनिक और 60 से ज्यादा टैंक। लोंगेवाला की रात्रि युद्ध ने साबित कर दिया — संख्या नहीं, संकल्प जीतता है। 5 और 6 दिसंबर 1971 की दरम्यानी रात को पाकिस्तान ने जैसलमेर जिले की लोंगेवाला पोस्ट पर हमला किया। मगर वहां खड़े थे मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के नेतृत्व में 23 पंजाब रेजीमेंट के 120 रणबांकुरे — जिनकी नसों में डर नहीं, देश था। पूरी रात गोलियों की बौछारों और टैंकों की गडग़ड़ाहट के बीच ये योद्धा दीवार बन खड़े रहे। न नींद टूटी, न हौसले।
जब सूरज की पहली किरण रेगिस्तान पर पड़ी, भारतीय वायुसेना के हंटर विमानों ने आसमान से आग बरसाई। दुश्मन के टैंक जलते रहे, सैनिक भागते रहे, और लोंगेवाला की धरती भारत की विजयगाथा गुनगुनाती रही। 1997 में आई फिल्म च्बॉर्डरज् ने इस युद्ध को परदे पर उतारा, लेकिन जैसलमेर के लोगों ने इसे ज़िंदगी में जिया है। विजय दिवस पर जब जयघोष गूंजता है, तो चांदपुरी की स्मृतियां फिर जीवित हो उठती हैं। वे 2018 में दुनिया से विदा हो गए, लेकिन लोंगेवाला के रेत-कण आज भी उनके साहस की कहानी सुनाते हैं।
जैसलमेर मुख्यालय से 10 किमी दूर स्थित जैसलमेर युद्ध संग्रहालय' हो या लोंगेवाला में बना स्मारक — दोनों ही भारत-पाक युद्ध की स्वर्णिम गाथा के जीते-जागते प्रमाण हैं। संग्रहालय में टैंकों, हथियारों, दस्तावेजों और चलचित्रों के ज़रिए उस ऐतिहासिक युद्ध को फिर से महसूस किया जा सकता है।