करीब 870 साल प्राचीन जैसलमेर के सोनार दुर्ग को देखने देश-दुनिया के सैलानी लाखों की तादाद में प्रतिवर्ष खींचे चले आते हैं।
करीब 870 साल प्राचीन जैसलमेर के सोनार दुर्ग को देखने देश-दुनिया के सैलानी लाखों की तादाद में प्रतिवर्ष खींचे चले आते हैं। समय के साथ-साथ जिम्मेदारों की उदासीनता की मार झेलने वाले इस हजारों की आबादी वाले रिहायशी किले की प्राचीरों से पत्थरों के गिरने से लेकर दीवार का पूरा हिस्सा तक धराशायी होने की कई घटनाएं अब तक घटित हो चुकी हैं। गत वर्ष अगस्त माह की 7 तारीख को शिव मार्ग की तरफ जाने वाले मार्ग में किले के परकोटे की दीवार के पत्थर भरभरा कर गिरे थे। उसके बाद कई महीनों की लेटलतीफी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से अब कहीं जाकर उस स्थान की मरम्मत और दीवार के पुनर्निर्माण व उससे थोड़ी दूरी पर शिव मार्ग पर ऐसा ही काम करवाया जा रहा है। इस देरी के कारण संबंधित क्षेत्रों में करीब आधा रास्ता विभाग की ओर से लगाए गए स्टील के बेरिकेड्स की वजह से रुका हुआ है। काम की जो गति है, उसे देखते हुए अभी तक कई महीनों का समय और लगने की संभावना है। बाहरी दीवारों के अलावा दुर्ग के भीतरी भाग में प्रोलों की दशा भी कोई बहुत सुदृढ़ नहीं है। जगह-जगह से किले की प्राचीरों के पत्थर अपनी जगह छोड़ते हुए नजर आते हैं।
एएसआइ की तरफ से पिछले वर्ष शिव मार्ग क्षेत्र में सोनार दुर्ग के परकोटे की एक जर्जर दीवार के हिस्से का पुनर्निर्माण करवाकर उसे मजबूत किया गया। बाद में बरसाती सीजन में उसी से थोड़ा आगे ऊपरी हिस्से में बुर्ज से सटे परकोटे की दीवार का एक हिस्सा गिर गया। अब भी परकोटे का करीब 200 मीटर का हिस्सा पुराना और कई जगहों से जर्जर होने के बाद चिंता का सबब बना हुआ है। उसमें कहीं-कहीं पर बड़े पत्थर अपनी जगह छोडकऱ बाहर आते प्रतीत होते हैं। तेज बारिश के दौरान मिट्टी का कटाव हुआ तो पूर्व में हुए हादसों की पुनरावृत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। दुर्ग के ऊपरी भाग में कई ऐसे स्थान हैं, जिनके पुनरुद्धार की आवश्यकता है।स्थानीय निवासियों के अनुसार जिम्मेदारों की कार्यशैली इतनी धीमी है कि जब तक एक जगह का सुधार होता है, तब तक कहीं और से पत्थर गिरने की घटना घटित हो जाती है।