भूमिगत जलस्तर गिरने से पानी में फ्लोराइड और टीडीएस की मात्रा निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक हो गई है। जलदाय विभाग की ओर से नहरी पानी को फ्लोराइड युक्त भूजल के साथ मिलाकर आपूर्ति की जा रही है, जिसे ग्रामीण पीने लायक नहीं मानते।
धार्मिक नगरी रामदेवरा और आसपास के गांवों में वर्षों से मीठे पानी की समस्या गंभीर बनी हुई है। नहर पास से गुजरने के बावजूद, घरों में नल से स्वच्छ जल उपलब्ध कराने का दावा अधूरा है। भूमिगत जलस्तर गिरने से पानी में फ्लोराइड और टीडीएस की मात्रा निर्धारित मानकों से कई गुना अधिक हो गई है। जलदाय विभाग की ओर से नहरी पानी को फ्लोराइड युक्त भूजल के साथ मिलाकर आपूर्ति की जा रही है, जिसे ग्रामीण पीने लायक नहीं मानते। लोग दैनिक कार्यों के लिए मिश्रित पानी का उपयोग करते हैं, लेकिन पीने के लिए निजी आरओ या बोतल बंद पानी खरीदने को मजबूर हैं। करीब 11 हजार की आबादी वाले रामदेवरा में प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख श्रद्धालु आते हैं, उन्हें भी मीठे पानी के लिए बोतलों पर निर्भर रहना पड़ता है।
नाचना से शुरू हुई पोकरण-फलसूंड पेयजल परियोजना, जो वर्ष 2005 में स्वीकृत हुई और 2009 में काम शुरू हुआ, अभी भी कई गांवों तक मीठा पानी नहीं पहुंचा पाई है। ग्रामीण गिरधारीलाल बताते हैं कि दशकों से मीठे पानी की आस अधूरी है। महेश कुमार कहते हैं कि नल का पानी फ्लोराइड युक्त होने से आरओ से पानी खरीदना पड़ता है। सामाजिक कार्यकर्ता राजुराम ने बताया कि इंदिरा गांधी नहर के समीप से पानी निकलने के बावजूद फिल्टर युक्त मिनरल पानी नहीं मिल रहा। प्रतिदिन 10 लाख लीटर नहरी पानी की आपूर्ति के बावजूद, करीब 5 लाख लीटर खारे पानी का मिश्रण करना पड़ता है, जिससे रामदेवरा में मीठा पानी एक सपना ही बना हुआ है।
-11 हजार की आबादी और प्रतिवर्ष 50 लाख श्रद्धालु मीठे पानी को तरस रहे हैं।
- प्रतिदिन 10 लाख लीटर नहरी पानी में करीब 5 लाख लीटर खारा पानी मिलाया जाता है।
-क्षेत्र में 300 से अधिक होटल-धर्मशालाओं के साथ ग्रामीण और यात्री बोतल बंद पानी पर निर्भर हैं, जिससे लाखों रुपए का पानी बिकता है।
रामदेवरा की आवश्यकता के अनुरूप फिल्टर किया हुआ नहरी पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। ऐसे में जितनी मात्रा में फिल्टर नहरी जल मिलता है, उसे नलकूपों के पानी के साथ मिश्रित कर क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति की जा रही है।
-सरिता मेघवाल, कनिष्ठ अभियंता, जलदाय विभाग, रामदेवरा