पानी की हर बूंद मरुस्थल के लिए अमूल्य होती है, लेकिन पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर जिले में हर साल लाखों लीटर बरसाती पानी नालों और नदियों के जरिए व्यर्थ बहकर वाष्पित हो जाता है।
पानी की हर बूंद मरुस्थल के लिए अमूल्य होती है, लेकिन पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर जिले में हर साल लाखों लीटर बरसाती पानी नालों और नदियों के जरिए व्यर्थ बहकर वाष्पित हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस जल को रोककर संरक्षित किया जाए तो न केवल पानी की कमी दूर हो सकती है, बल्कि किसानों और पशुपालकों को भी राहत मिल सकती है। गौरतलब है कि जिले की प्रमुख नदियां— काकनय, काहला और चांदन— वर्षा के दौरान भर जाती हैं, लेकिन उचित प्रबंधन के अभाव में इनका पानी विशाल रिण क्षेत्रों में जाकर समाप्त हो जाता है।
मरुस्थलीय क्षेत्र में बरसात सीमित होती है और जल का संचयन न होने के कारण भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। पारंपरिक जल स्रोत जैसे खड़ीन, तालाब, कुएं और बावडिय़ां कभी जल संरक्षण के लिए प्रभावी थे, लेकिन आधुनिक समय में इनकी अनदेखी हो रही है। यदि वर्षाजल को रोककर कृषि, पशुपालन और पेयजल के लिए इस्तेमाल किया जाए तो यह जैसलमेर की जल समस्या का हल हो सकेगा।
पालीवाल ब्राह्मणों की ओर से विकसित खड़ीन प्रणाली जल संरक्षण का सबसे प्रभावी तरीका था, जिसमें बारिश के पानी को बड़े खेतों में रोका जाता था और धीरे-धीरे मिट्टी में रिसकर यह पानी लंबे समय तक कुओं और तालाबों में उपलब्ध रहता था। किसान और आमजन को जैसलमेर जिले के 84 गांवों में स्थित खड़ीनों का अध्ययन करने की दरकार है, ताकि पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों को पुनर्जीवित किया जा सके।
इतिहासवेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल का कहना है कि काकनय, काहला और गोगड़ी नदियों के पानी को रोकने के लिए छोटे बांध, एनीकट और जलाशयों का निर्माण किया जाए, ताकि यह पानी वाष्पीकरण से पहले उपयोग में लाया जा सके। इसके साथ ही शहरों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया जाए और प्रत्येक घर, सरकारी भवन एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में इस तकनीक को अपनाया जाए। जैसलमेर के चारों तरफ सैकड़ों की संख्या में विशाल तालाब जो मिट्टी से अटे पडे उनको खुदवाकर बारिश के जल को लम्बे समय तक के लिए संरक्षित किया जा सकता है, ताकि आसपास रहने वाले लोागे को पीने का पानी सुलभ हो सके। प्रशासन को चाहिए कि मनरेगा के तहत तालाबों की खुदाई को सुनिश्चित किया जाए।
-शहरों में नालों के जरिए बहने वाले पानी को रोककर पुन: उपयोग लायक बनाया जाए।