यह व्यवस्था गजरूपसागर फिल्टर प्लांट से मोहनगढ़ स्थित लिफ्ट परियोजना स्थल पर स्थापित है। दूसरी तरफ जैसलमेर शहरी क्षेत्र में लाइनों में लीकेज आने पर विभाग को लोगों की जागरुकता पर निर्भर रहना होता है, जिससे कई बार हजारों लीटर पीने का पानी व्यर्थ बह जाता है। शहर क्षेत्र में पाइपलाइन लीकेज होने पर विभाग के पास यह पता लगाने की कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं है कि आखिर कितना पानी रास्ते में ही नष्ट हो रहा है।
मरुस्थलीय जिले जैसलमेर में जहां हर बूंद पानी कीमती मानी जाती है, वहां जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (जलदाय) ने वाटर लॉस ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए लाइनों की देखभाल की व्यवस्था की हुई है। यह व्यवस्था गजरूपसागर फिल्टर प्लांट से मोहनगढ़ स्थित लिफ्ट परियोजना स्थल पर स्थापित है। दूसरी तरफ जैसलमेर शहरी क्षेत्र में लाइनों में लीकेज आने पर विभाग को लोगों की जागरुकता पर निर्भर रहना होता है, जिससे कई बार हजारों लीटर पीने का पानी व्यर्थ बह जाता है। शहर क्षेत्र में पाइपलाइन लीकेज होने पर विभाग के पास यह पता लगाने की कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं है कि आखिर कितना पानी रास्ते में ही नष्ट हो रहा है।
ऐसे में कई बार लोगों को कम दबाव या बाधित जलापूर्ति का सामना करना पड़ता है। शहर में जलदाय विभाग मुख्य रूप से शिकायत आधारित व्यवस्था पर निर्भर है। कहीं पाइपलाइन टूटने या रिसाव होने की सूचना मिलने पर ही मरम्मत की कार्रवाई होती है। कई बार दूर-दराज इलाकों या भूमिगत पाइपलाइन में लंबे समय तक लीकेज चलता रहता है और लाखों लीटर पानी रेत में समा जाता है।
विभाग की तरफ से गजरूप सागर और मोहनगढ़ में फ्लो मीटर लगाए गए हैं। गजरूपसागर प्लांट पर निर्धारित समय में कम मात्रा में पानी आते ही मोहनगढ़ स्थित मशीनरी को मैसेज किया जाता है कि लाइन में कहीं लीकेज है। जिसके बाद वहां की टीम पूरी लाइन की पेट्रोलिंग कर लीकेज ढूंढ़ती है और बाद में उसे दुरुस्त करने का काम किया जाता है। ऐसे ही गजरूपसागर में 13.5 केजी प्रेशर से पानी पहुंचता है। यदि 2 केजी भी कम प्रेशर आता है तो इसका मतलब यह निकलता है कि लाइन में कहीं लीकेज है। यह लीकेज फिर जैसलमेर की तरफ माना जाता है और उसके अनुसार लाइन का सर्वे कर उसका पता लगाया जाता है।
-जैसलमेर शहर में पिछले कई वर्षों में पुरानी पाइपलाइनों की जगह नई लाइनें बिछाए जाने से लीकेज की समस्या का काफी हद तक समाधान किया गया है।
-दूसरी तरफ जैसलमेर से मोहनगढ़ के बीच की लाइन करीब दो दशक पुरानी हो चुकी है।
-गर्मी के मौसम में बढ़ते दबाव और तापमान के कारण पाइपलाइन फटने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
-कई स्थानों पर लीकेज के कारण सडक़ों पर पानी बहता दिखाई देता है, लेकिन मरम्मत में देरी होने से स्थिति और खराब हो जाती है। -विशेषज्ञों का कहना है कि जल वितरण नेटवर्क में हर कहीं स्मार्ट सेंसर, फ्लो मीटर और जीआइएस आधारित वाटर लॉस ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाए तो रिसाव वाले क्षेत्रों की तुरंत पहचान संभव हो सकती है।
जलापूर्ति व्यवस्था में कई बार सडक़ निर्माण, सीवरेज कार्य या अन्य विभागीय खुदाई के दौरान पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके बाद मरम्मत और जिम्मेदारी को लेकर विभागों के बीच समन्वय की कमी सामने आती है। कई मामलों में यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि नुकसान की भरपाई कौन करेगा। इसी कारण छोटी समस्याएं भी लंबे समय तक बनी रहती हैं।
जैसलमेर के गजरूपसागर से मोहनगढ़ के बीच की लाइनों में लीकेज का पता लगाने के लिए फ्लो मीटर व प्रेशर गेज व्यवस्था से लीकेज का पता लगाना आसान हुआ है। शहरी क्षेत्र में लोग लाइन के लीकेज होने की सूचना दे देते हैं। जिसके बाद तुरंत कार्रवाई की जाती है। हमारा जोर लीकेज आने पर तत्काल उसे दुरुस्त करने पर रहता है।
- देवीलाल भील, सहायक अभियंता नगर, जलदाय विभाग, जैसलमेर