
जैसलमेर. कुछ दशक पहले तक जिन धोरों को केवल रेत का विस्तार माना जाता था, आज वही क्षेत्र पर्यटन, निवेश और भविष्य की अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्र बनते जा रहे हैं। थार का बदलता भूगोल स्पष्ट संकेत दे रहा है कि देश के पर्यटन शहरों में अब सबसे बड़ा संसाधन केवल पर्यटक नहीं, बल्कि सुरक्षित, नियोजित और संरक्षित भूमि भी है।
जैसलमेर इस परिवर्तन का सबसे सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है। सम के धोरे, शहर के बाहरी क्षेत्र और आसपास के गांव तेजी से पर्यटन गतिविधियों के नए केंद्र बन रहे हैं। इसके साथ जमीन का मूल्य लगातार बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में सरकारी और सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हो गई है।
जैसलमेर में भूमि का महत्व तीन चरणों में तेजी से बदला है। पहले रेगिस्तानी भूमि का उपयोग सीमित था। पर्यटन के विस्तार के साथ आर्थिक गतिविधियां बढ़ीं। अब यही जमीन निवेश, अधोसंरचना और दीर्घकालीन विकास की रणनीतिक पूंजी बन चुकी है।
पर्यटन विस्तार ने धोरों, डेजर्ट कैंप, हेरिटेज पर्यटन और साहसिक पर्यटन को नई पहचान दी। सड़क, ऊर्जा और बेहतर कनेक्टिविटी जैसी आधारभूत परियोजनाओं ने दूरस्थ क्षेत्रों को भी निवेश के लिए आकर्षक बनाया। पर्यटन उद्योग के विस्तार से नई जमीन की मांग बढ़ी, जबकि शहरों का फैलाव पारंपरिक सीमाओं से बाहर तक पहुंच गया।
भूमि प्रबंधन की यह चुनौती केवल जैसलमेर तक सीमित नहीं है। देश के अनेक पर्यटन क्षेत्रों में यही स्थिति दिखाई दे रही है। रेगिस्तानी क्षेत्रों में पर्यटन और ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है। तटीय शहर सीमित भूमि और बढ़ते पर्यटन दबाव से जूझ रहे हैं। विरासत शहरों में संरक्षण और आधुनिक विकास के बीच संतुलन बनाना चुनौती बन गया है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों और पर्यावरण संरक्षण के बीच समन्वय की आवश्यकता बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक भूमि भविष्य की विकास योजनाओं की आधारशिला होती है। नई सड़कें, सार्वजनिक सुविधाएं, पर्यटन अधोसंरचना, हरित क्षेत्र, पर्यावरण संरक्षण और नियोजित शहरी विस्तार के लिए पर्याप्त भूमि सुरक्षित रखना अनिवार्य है। इसी कारण भूमि संरक्षण अब केवल राजस्व प्रशासन का विषय नहीं, बल्कि दीर्घकालीन विकास नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
पर्यटन क्षेत्रों में जमीन का महत्व जितनी तेजी से बढ़ रहा है, भूमि प्रबंधन व्यवस्था उसी गति से विकसित नहीं हो पाई है। पुराने राजस्व रिकॉर्ड और वर्तमान भू-उपयोग के बीच अंतर, विशाल क्षेत्रों की नियमित निगरानी, प्रारंभिक स्तर पर अतिक्रमण की पहचान तथा भविष्य की जरूरतों के लिए भूमि सुरक्षित रखना प्रमुख चुनौतियां बन गई हैं।
- अनिल पंडित, पर्यटन विशेषज्ञ