Motivational Story: मिट्टी के मैदान से अमेरिका तक... अंतरराष्ट्रीय फुटबॉलर ज्योति चौहान ने पत्रिका से साझा किए अनुभव...।
MP Daughter Success Story: ज्योति चौहान की कहानी सिर्फ फुटबॉल की नहीं, बल्कि उस जिद, संघर्ष और हौसले की कहानी है, जो हालातों के आगे कभी झुकी नहीं। मध्यप्रदेश के छोटे से शहर की गलियों में फुटबॉल को उत्सुकता भरी नजरों से देखने वाली यह लड़की यूरोप में इतिहास रचने के बाद अमेरिका की धरती पर अपना जलवा दिखाने जा रही है। भारतीय महिला फुटबॉल टीम की स्टार स्ट्राइकर ज्योति चौहान इन दिनों झाबुआ में आयोजित होने वाली पहली महिला राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप की तैयारियों के सिलसिले में आई हुई हैं। इस दौरान उन्होंने अपने संघर्ष से सफलता तक के सफर को साझा किया, जो हर उस लड़की के लिए मिसाल है जो सपने देखने की हिम्मत रखती है।
ज्योति चौहान बताती हैं कि चौथी कक्षा में पहली बार उन्होंने अपने घर के पीछे मैदान में लड़कों को फुटबॉल खेलते देखा था। उन्हें हैरानी होती थी कि आखिर 22 लोग एक ही गेंद के पीछे क्यों भागते हैं। लेकिन, यही जिज्ञासा धीरे-धीरे जुनून में बदल गई। 5वीं कक्षा में कोच शैलेन्द्र पाल ने उनकी प्रतिभा पहचानी और प्रशिक्षण देना शुरू किया। छठी कक्षा में मणिपुर में आयोजित नेशनल एसजीएफआइ प्रतियोगिता में खेलने का मौका मिला। वहीं से मिले फुटबॉल शूज उनके लिए 'लकी शूज' बन गए। ज्योति मुस्कुराते हुए कहती हैं- मैंने उन जूतों को तीन साल तक संभालकर पहना। वे सिर्फ शूज नहीं, मेरे सपनों की शुरुआत थे।
जब ज्योति चौहान 7वीं कक्षा में थीं, तभी एक सड़क हादसे में उनके पिता रमेश चौहान का निधन हो गया। पांच बेटियों वाले परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पिता हमेशा उन्हें खेलने के लिए प्रेरित करते थे, लेकिन उनके जाने के बाद समाज के ताने शुरू हो गए, लड़कियां फुटबॉल नहीं खेलतीं। उस वक्त ज्योति टूटने लगी थीं, लेकिन उनकी मां रेखा चौहान ढाल बनकर खड़ी रहीं। खेतों में मजदूरी कर उन्होंने परिवार भी संभाला और बेटी के सपनों को भी जिंदा रखा। मां की एक बात आज भी ज्योति को ताकत देती है, तू हमारी बेटी नहीं, बेटा है।
अमेरिका-यूरोप में सफलता का परचम लहराने के बाद अब ज्योति का अगला पड़ाव नॉर्थ अमेरिका है। उन्होंने पनामा क्लब के साथ करार किया है और जल्द ही अमेरिकी मैदानों पर नजर आएंगी। उनकी कहानी सिर्फ खेल की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है जो कहती है, अगर सपनों में आग हो, तो गरीबी, ताने और मुश्किलें रास्ता नहीं रोक सकतीं।
आठवीं कक्षा में ज्योति का चयन ऑस्ट्रेलिया में होने वाले इंटरनेशनल ट्रायल्स के लिए हुआ, लेकिन वीजा रिजेक्ट हो गया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। खुद से वादा किया कि अब मेहनत के दम पर भारत की जर्सी पहननी है। नौवीं पास करते ही उनका चयन सीनियर इंडिया टीम कैंप में हो गया। गोवा कैंप में सीनियर खिलाडिय़ों को देखकर उन्हें अपनी कमियों का एहसास हुआ और यहीं से उन्होंने खुद को पूरी तरह खेल के लिए समर्पित कर दिया।
इसके बाद ज्योति ने बॉम्बे क्लब और फिर देश के प्रतिष्ठित क्लब गोकुलम केरला एफसी के लिए खेला। शानदार प्रदर्शन के दम पर वह प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट चुनी गईं। कोलकाता में हुए यूरोपियन ट्रायल्स ने उनकी जिंदगी बदल दी। स्पेन, ऑस्ट्रेलिया और क्रोएशिया के क्लबों ने उनमें रुचि दिखाई, लेकिन ज्योति ने क्रोएशिया के प्रतिष्ठित क्लब 'डायनामो जाग्रेब' को चुना।
क्रोएशियाई लीग में जेडएनके एग्राम के खिलाफ खेलते हुए ज्योति ने हैट्रिक लगाकर इतिहास रच दिया। वह यूरोपियन टॉप डिवीजन फुटबॉल में हैट्रिक लगाने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं। फाइनल मुकाबले में भी उनके गोल ने भारत का नाम रोशन किया। बहनों ने भी थामा फुटबॉल का रास्ता ज्योति की सफलता का असर अब पूरे परिवार में दिख रहा है। उनकी छोटी बहन दीपिका 15 बार नेशनल खेल चुकी हैं, जबकि पायल 13 नेशनल प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं। झाबुआ की यह बेटियां अब सिर्फ अपने परिवार का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश का गौरव बन चुकी हैं।