
झाबुआ. बोवनी के समय चबूतरे पर गुमसुम बैठे लोगों से पत्रिका की टीम ने गांव के हाल जानने चाहे तो पता चला सभी लोग अलग-अलग गांव के हैं। इसमें से कुछ गुजरात से अपने गांव आए हैं।
गुजरात से सब कुछ खर्च कर आए अब तो बोवनी के लिए बीज लाने के पैसे भी नहीं है। डूमपाड़ा के शैतान मेड़ा, फतेह सिंह निनामा, फुलधावड़ी के कांतिलाल निनामा, ग्राम चौरा के झितरा पिता गल्लू बिलवाल एवं तेरसिंह बिलवाल, कलमसिंह भोयरा यह चौरा गांव में एक चौपाल पर बैठकर चर्चा कर रहे थे। सभी नेे बारी-बारी बताया हमारे साथ-साथ गांव के दूसरे लोग भी बहुत तकलीफ देख रहे हैं। गुजरात जाने ने डर लगता है . कुछ दिन पहले गुजरात से रमेश पिता तौलिया मचार अपने गांव डूमपाड़ा आएए अपनी दो पत्नियां उनके बच्चे ए लडक़ों के पत्नि और बच्चे मिलाकर परिवार में लगभग 20 सदस्य हैं। परिवार के सभी सदस्य 2 साल पहले पलायन कर गुजरात गांधीधाम में रह रहे थे। परिवार का हर सदस्य मजदूरी करने लगा। खेत में काम करने वाला कोई नहीं था। इस कारण खेती भी नहीं की थी। मजदूरी बंद होने पर दो साल की बचत भी इन 40 दिनों में खर्च हो गई। थोड़े से पैसे बचे थे। इससे गांव में राशन पानी की व्यवस्था हो जाए, लेकिन वह भी बस कंडक्टर ने ले लिए। कुछ साथ लेकर नहीं आए। अब गांव में खाने-पीने तक के ठिकाने नहीं। बोनी करने के लिए बीज खरीदने के पैसे नहीं है। कोरोना वायरस के चलते यहां आ गए। परिवार अब मजदूरी करना तो दूर गुजरात के नाम से भी डरने लगा है।झिरी का पानी पीने को मजबूर परिवार . फुल धावड़ी के जोगिया मचार के परिवार में 8 सदस्य के लिए पीने का पानी तक नहीं। बच्चों के पास पहनने के लिए कपड़े तक नहीं। घर के पास से जा रहे नाले पर झिरी बनाकर पानी निकाल रहे हैं। खाने पीने के लिए कुछ नहीं। कपिलधारा की सुविधा नहीं मिली। सार्वजनिक कुआं आदि भी नहीं। स्थिति गंभीर बनी हुई है।
पीने के पानी के लिए हैंडपंप नहीं
गांव के आसपास चार-पांच किलोमीटर दूर तक कोई हैंडपंप नहीं है। अधिकतर लोग झिरी का पानी पी रहे हैं। हैंडपंप की मांग भी की लेकिन आज तक कोई नहीं आया। मजदूरों को लाने के वसूल डेढ़ लाख .फुलधावड़ी के राकेश भूरिया ने बताया रविवार सुबह 10 बजे राजकोट से आइसर में मेरे गांव के ही एक परिचित नरवा पिता पानू भूरिया आ रहे थे। कोई वाहन नहीं होने के कारण मैं उन्हें लेने पिटोल पहुंचा। मैंने देखा एक 12 चक्कर का ट्रक मवेशियों की तरह मजदूरों को भरकर गरबाड़ा रुका था। मेरे परिचित भी इस ट्रक में थे। उसमें से उतरने पर नरवा से बात की तो पता चला आइसर में राजकोट से लाने के लिए कुल डेढ़ लाख रुपए वसूल किया। सौ सवारी भरने में लगभग एक घंटा लगा। वहां सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी। सबसे डेढ़ हजार रुपए लिए तभी राजकोट से गाड़ी निकली। यह सभी मजदूर झाबुआ एवं पारा के आसपास रहने वाले थे। इनके पास पैसे नहीं थे उसे राजकोट में ही ट्रक पर चढऩे नहीं दिया। लोग एक पैर पर खड़े रहकर आए छोटे बच्चे माता-पिता की गोद में थे लोगों को सांस लेने तक में दिक्कत हो रही थी।