
Jhabua news: सपने बड़े हों तो शहर की सीमाएं भी छोटी पड़ जाती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है कोलकाता की युवा नृत्यांगना पायल घोष ने। महज पांच साल की उम्र में पैरों में घुंघरू बांधकर शुरू हुआ उनका सफर आज कोलकाता से करीब 1800 किलोमीटर दूर झाबुआ के आदिवासी अंचल में बच्चों को शास्त्रीय नृत्य की बारीकियां सिखाने तक पहुंच गया है। पायल यहां सिर्फ कथक और भरतनाट्यम नहीं सिखा रहीं, बल्कि स्थानीय बच्चों में आत्मविश्वास, अनुशासन और भारतीय कला-संस्कृति के प्रति लगाव भी पैदा कर रही हैं।
पायल की जिंदगी में सबसे कठिन दौर तब आया, जब महज 11 वर्ष की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया। परिवार के लिए यह बड़ा आघात था, लेकिन मां इति घोष ने बेटी के सपनों को टूटने नहीं दिया। मां के विश्वास और लगातार सहयोग ने पायल को आगे बढने की ताकत दी। नृत्य के प्रति समर्पण को उन्होंने शिक्षा से भी जोड़ा और नृत्य में एमए की डिग्री हासिल की। महज 19 वर्ष की उम्र से उन्होंने बच्चों को नृत्य सिखाना शुरू कर दिया।
पायल का सपना है कि झाबुआ का हर बच्चा आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े और जिले की प्रतिभाएं देश के बड़े सांस्कृतिक मंचों पर अपनी अलग पहचान बनाएं। कोलकाता से झाबुआ तक का उनका सफर बताता है कि सही हौसला मिले तो प्रतिभा को उड़ान भरने के लिए महानगर नहीं, सिर्फ एक अवसर चाहिए।
वर्ष 2023 में डांस टीचर के रूप में करियर शुरू करने वाली पायल ने बच्चों को शास्त्रीय नृत्य से जोडने के लिए वर्ष 2026 में 'नटराज डांस एकेडमी' की शुरुआत की। वर्तमान में 25 बच्चे यहां कथक और भरतनाट्यम की विधाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं। पायल के लिए यह महज डांस क्लास नहीं, बल्कि उस सपने का विस्तार है, जिसे उन्होंने बचपन में देखा था।
पायल बच्चों को नृत्य के साथ यह भी समझाती हैं कि शास्त्रीय नृत्य केवल ताल और शरीर की गति नहीं, बल्कि भावों और अभिव्यक्ति की कला है। चेहरे की भाव-भंगिमाएं और हाथों की मुद्राएं बिना शब्दों के कहानी कहने का माध्यम बनती हैं। नवरसों की अभिव्यक्ति और हस्त मुद्राओं के जरिए बच्चे भारतीय संस्कृति को करीब से समझ रहे हैं।