-शहरी इलाकों में बढ़ता शोरगुल, तनाव और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका झालावाड़.शहरी इलाकों में बढ़ता शोरगुल गंभीर समस्या बनता जा रहा है। इससे नागरिकों की सेहत प्रभावित हो रही है, वहीं विभिन्न इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए असुविधा का कारण बन रहा है। खासतौर पर अस्पताल के साइलेंस जोन,आवासीय इलाकों में शोर […]
-शहरी इलाकों में बढ़ता शोरगुल, तनाव और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका
झालावाड़.शहरी इलाकों में बढ़ता शोरगुल गंभीर समस्या बनता जा रहा है। इससे नागरिकों की सेहत प्रभावित हो रही है, वहीं विभिन्न इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए असुविधा का कारण बन रहा है। खासतौर पर अस्पताल के साइलेंस जोन,आवासीय इलाकों में शोर की समस्या चिंता का विषय है। बढ़ते शोर से मानसिक तनाव, नींद की समस्या और हृदय संबंधी बीमारियां बढऩे की आशंका रहती है। झालावाड़ के जिला अस्पताल के आसपास शोर (ध्वनि) का स्तर लगातार बढ़ रहा है। यह अस्पताल के साइलेंस जोन के लिए बड़ी चुनौती है। अस्पताल में शांति जरूरी होती है,ताकि मरीजों को ठीक से आराम मिल सके और इलाज सही ढंग से हो सके। शोर के कारण मरीजों की मानसिक स्थिति प्रभावित होती है जो उपचार में लगने वाले वक्त को बढ़ा देती है। वहीं मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या भी बढ़ रही हैं। यह स्थिति गंभीर मरीजों के लिए और भी खतरनाक है।
ये है डेसिबल का मानक स्तर-
श्रेणी दिन रात
आवासीय 55 45
व्यावसायिक 65 55
इंडस्ट्रियल 75 70
साइलेंस जोन 50 40
चिकित्सा सूत्रों ने बताया कि शहर के एसआरजी व जनाना चिकित्सालय बिलकुल रोड के निकट होने से दिनभर हॉर्न की आवाज आती है। वहीं दिनभर अस्पताल के सामने वाहनों की रेलम पेल लगी रहती है। कई बार तो जाम की स्थिति होने से शोर की आवाज अस्पताल के अंदर तक आती है। यहां कई बार तो60 से 70 डेसीबल तक आवाज आती है।
जानकारों ने बताया कि आवासीय क्षेत्रों व चिकित्सालयों के आसपास ध्वनि प्रदूषण की स्थिति गंभीर है। अस्पताल के पास शोर का स्तर बढ़ है,जो लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहा है। खासकर रात के समय शोर के स्तर में वृद्धि होने से लोगों की नींद में खलल पड़ रहा है। यह बढ़ता शोर व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक सेहत पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार शोर के संपर्क में रहने से मानसिक तनाव, दिल की बीमारियां और सुनने की क्षमता में कमी हो सकती है।
शहर में मिनी सचिवालय के पीछे रीको औद्योगिक क्षेत्र में कोटा स्टोन की इकाइयों पर दिनरात-पत्थर चिराई का काम करने वाले लोगों में शोर की समस्या गहरी होती जा रही है। यहां कई तरह के बेल्डिंग व अन्य व्यावसाय से जुड़े कामकाजी लोगों के लिए स्वास्थ्य के खतरे का बड़ा अलर्ट है। लंबे समय तक शोरगुल के बीच काम करने से मानसिक थकावट, उच्च रक्तचाप और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती है।
ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए करें उपाय
साइलेंस जोन का कड़ाई से पालना: अस्पतालों और स्कूलों में साइलेंस जोन की सीमा का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई: व्यावसायिक और आवासीय क्षेत्रों में शोर की सीमा से अधिक शोर होने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई हो।
शहरी योजनाओं में सुधार: शहरी विकास के समय ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जन जागरूकता अभियान: आमजन को शोर (ध्वनि) प्रदूषण के प्रभावों के बारे में जागरूकता करने की आवश्यकता है।
साइलेंस जोन में तेज आवाज में हॉर्न बजाना प्रतिबंधित होना चाहिए। जो लोग फैक्ट्री या पत्थर चिराई आदि का काम करते हैं उन्हे कान में इयर प्लग लगाना चाहिए। लंबे समय तक डीजे या तेज आवाज के संपर्क में रहने से कान के पर्दे फटने या कान की नशे कमजोर होने का डर रहता है। कई बार कान में लगातार सीटी बजने जैसी समस्या हो सकती है। जो लोग ब्लूटूथ या इयरफोन लगाकार लंबे समय तक पढ़ाई करते है, तो इससे भी नुकसान होता है। इसकी बजाई सामने स्पीकर रखकर पढ़ाई करें।
अस्पताल के सामने ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ लगातार कार्रवाई करते हैं। सर्विस लेन जाम करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे। यहां कारें व अन्य वाहन खड़े करने को दिखवाया जाएगा, ताकि मरीजों को किसी तरह की परेशानी नहीं हो।