
सुनेल क्षेत्र के सेमला में एक खेत पर अफीम के डोडों पर चीरा लगाने से पूर्व पूजा करते किसान। फोटो पत्रिका
Rajasthan Opium Crop : झालावाड़ के सुनेल क्षेत्र में खेतों पर मां कालिका की प्रतिमा स्थापना के साथ ही अफीम के डोडों में चीरा लगाने का कार्य शुरू हो गया है। अफीम की फसल को किसान किस तरह सावधानी पूर्वक संजोकर उसे बड़ी करता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसान अफीम की बुवाई के बाद खेत के अंदर कभी चम्पल, जूते पहनकर नहीं जाता।
सुनेल सहित क्षेत्र में यौवन पर आई ‘काले सोने’ यानी अफीम की फसल में किसानों ने शुभ मुहूर्त में धार्मिक विधि-विधान से मां काली की पूजा-अर्चना कर लुवाई-चिराई का कार्य प्रारंभ किया। किसानों का मानना है कि अच्छी पैदावार और सुख-समृद्धि की कामना से मां कालिका की पूजा कर डोडों पर चीरा लगाने की परंपरा है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘नाणा’ कहा जाता है।
किसान घरों से पूजा सामग्री लेकर खेतों में पहुंचते हैं। तब शुभ दिशा में क्यारी की डोली पर देवी प्रतिमा स्थापित कर रोली बांधी, घी-तेल का दीपक जलाया, अगरबत्ती लगाई और नारियल चढ़ाते हैं। इसके बाद पांच पौधों पर लच्छा बांधकर डोडों पर चीरा लगाया तथा अच्छी पैदावार की कामना करते हैं।
सेमला गांव निवासी किसान मोहनलाल मेघवाल, बापूलाल मेघवाल, हरिनारायण शर्मा, रामकरण मेघवाल और महावीर प्रसाद मेघवाल ने बताया कि नाणा से पूर्व माता की पूजा की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। डोडों पर दिन में ‘नक्का’ नामक विशेष औजार से चीरा लगाया जाता है। अगले दिन सुबह पूजा के बाद छरपलों से अफीम का दूध एकत्र किया जाता है। लुवाई-चिराई के बाद सूखे डोडों से पोस्त दाना निकाला जाता है।
हालांकि डोडा चूरा खेतों में ही नष्ट कराने का प्रावधान है, फिर भी इसकी तस्करी होती है। मध्यप्रदेश के सीमावर्ती इलाकों और सुनेल क्षेत्र में अफीम की बुवाई के साथ ही तस्करों की गतिविधियां बढ़ने लगती हैं। अफीम की खेती सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स की निगरानी में होती है, लेकिन डोडों पर चीरा लगते ही अवैध गतिविधियों की आशंका भी बढ़ जाती है। खेत में तैयार अफीम पर सरकार का अधिकार होता है।
शुद्ध अफीम में अन्य पाउडर मिलाकर उसका वजन बढ़ाने के मामले भी सामने आते हैं। आधा किलो शुद्ध अफीम में कॉफी पाउडर, बोर्नविटा जैसे पाउडर मिलाकर इसका वजन ढाई से तीन किलो कर दिया जाता है।
लुवाई के दौरान किसान खेतों में झोपड़ी बनाकर वहीं निवास करते हैं और दिन-रात रखवाली करते हैं। डोडों पर चीरा लगने के साथ ही उनकी दिनचर्या बदल जाती है। क्षेत्र में अधिकांश स्थानों पर चिराई का कार्य प्रारंभ हो चुका है।
Updated on:
12 Feb 2026 07:44 am
Published on:
12 Feb 2026 07:42 am
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