एसआरजी चिकित्सालय की व्यवस्था इन दिनों वेंटिलेटर पर है। जिम्मेदारों की निर्णय क्षमता शिथिल नजर आ रही। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र 70 हजार के स्टेपलाइजर के चक्कर में मरीजों की जान से खिलवाड़ हो रहा है
.एसआरजी चिकित्सालय की व्यवस्था इन दिनों वेंटिलेटर पर है। जिम्मेदारों की निर्णय क्षमता शिथिल नजर आ रही। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र 70 हजार के स्टेपलाइजर के चक्कर में मरीजों की जान से खिलवाड़ हो रहा है। करोड़ों रुपए के टेंडर मेडिकल कॉलेज में हो रहे हैं,लेकिन मेडिकल कॉलेज प्रशासन दो स्टेपलाइजर खरीदने की जहमत नहीं उठा पा रहा है। भले ही मरीज की जान चली जाए। तीन दिन पहले ऐसा ही हुआ। ब्लड बैंक की दोनों मशीने बंद पड़ी है। उधर निजी ब्लड बैंक से जनाना में भर्ती एक प्रसूता के नवजात को देरी से खून मिला तो उसकी मौत हो गई। इसके बावजूद मेडिकल कॉलेज प्रशासन की नींद नहीं टूटी। ऐसा ही गुरुवार को भी देखने को मिला।
डायलिसिस होना था-
एसआरजी में एक महिला मरीज कौशल्या का डायलिसिस होना था। डॉक्टरों ने तुरंत बी पॉजिटिव खून की जरुरत बताई। परिजनों ने संपर्क किया तो समाजसेवी आगे आए। समाजसेवी सचिन कश्यप ने चार बजे इधर-उधर बात कर बी पॉजिटिव ग्रुप के रक्तदाता से संपर्क किया। इस पर पिपलोद गांव में खेत पर काम कर रहा रक्तदाता धर्मेश्वर राठौर शाम करीब 5 बजे एसआरजी पहुंच गए।
इधर-उधर घूमते रहे-
करीब एक घंटे तक तो वे ब्लड बैंक में इधर-उधर घूमते रहे। आखिर में बताया गया कि यहां तो मशीन खराब हो रही है। निजी ब्लड बैंक से खून लेकर आओ। ऐसे में रक्तदाता झालरापाटन रोड स्थित एक निजी ब्लड बैंक में गया और वहां से बी पॉजिटिव खून लेकर आए, तब जाकर गंभीर मरीज की डायलिसिस की गई। यह यहां रोज मरीजों की जान सांसत में आ रही है, इसके बावजूद मेडिकल कॉलेज प्रशासन आंखे बंद कर मूकदर्शक बना हुआ है।