झालावाड़

आधुनिक तकनीक से खरबूजे की खेती कर कमाए लाखों

—परिवार की आय का स्रोत बनी फसल —काली व भूरी मिट्टी में ले रहे उपज—नियमित सिंचाई से मिले अच्छे परिणाम झालावाड़ जिले के रटलाई क्षेत्र के किसान मोहनलाल लोधा व उनका परिवार राजस्थान पत्रिका का एग्रोटेक पेज नियमित रूप से पढ़ते हैं। खेती की नवीन जानकारियों से प्रेरित हो उन्होंने भी खरबूजे की खेती में नवाचार किया। उन्होंने एक माह में ही दो लाख रुपए की आय हासिल की है। इसमें उन्हें कृषि विज्ञान केन्द्र व उद्यानिकी विभाग का भी सहयोग मिला।
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Updated: 21 Apr 2023, 11:53 AM IST
आधुनिक तकनीक से खरबूजे की खेती कर कमाए लाखों
आधुनिक तकनीक से खरबूजे की खेती कर कमाए लाखों

पांच बीघा में एक लाख का खर्चा
क्षेत्र के कई किसान खेती में नये प्रयोग कर आधुनिक खेती की तरफ बढ़ रहे हंै। गांव मेलकी का किसान परिवार जिसमें पिता लालचंद लोधा व उसके तीन पुत्र मोहनलाल, हेमराज एवं रायसिंह ने पांच बीघा में मीठे खरबूजे की फसल बोई। इसमें एक लाख खर्चा आया। खेत में भरपूर मात्रा में खरबूजे आ रहे हैं। इसमें उन्हें झीतापुरा के किसान गौरीलाल लोधा से भी मार्गदर्शन मिला।

तीन से चार बार करें जुताई-हकाई
किसान मोहनलाल ने बताया कि खरबूजे की बुवाई करने के लिए खेत की तीन से चार बार जुताई-हकाई करनी चाहिए। इस जमीन में गोबर की खाद दें। उसमें ट्रैक्टर की सहायता से बडी डोरियां बनाई जाती हैं। इनके बीच ड्रिप लाइन बिछाई जाती है। इन मिट्टी की डोरियों पर पॉलीथिन फैलाकर उसमें समान दूरी पर छेद कर उसमें खरबूजे के बीज डाले। बूंद-बूंद सिंचाई से सभी बीजों को पानी मिल जाता है। समय-समय पर खाद व दवाईयां दी जाती हैं। इसकी बुवाई दिसम्बर में की गई जिसमें प्रथम बार मार्च में फल लगने शुरू हो गया था ।

कम समय में अधिक कमाई
रटलाई क्षेत्र के कई किसानों को प्याज, लहसुन आदि की उपज में लाखों खर्च करने के बावजूद अच्छे परिणाम नहीं मिल पा रहे थे। लोधा परिवार ने तीन महीने पहले खरबूजे की बुवाई की। नियमित सिंचाई व देखरेख से मार्च-अप्रेल में मीठे खरबूज लगना शुरू हो गए। इन्हें वे जयपुर, नीमच व अन्य मण्डिय़ों में बेच रहे हैं।

मिठास से बनी पहचान...
खरबूज को बेल से कच्चे ही अलग कर देते हैं। कुछ समय के लिए ढक कर रखने से ये पक जाते हैं और मीठे स्वादिष्ट हो जाते हैं। किसान ने काली-भूरी मिट्टी में यह कमाल कर दिखाया। पहले यह भ्रांति थी कि खरबूज तालाब की रेतीली मिट्टी में ही हो सकते हैं।

लालचंद सुमन — रटलाई

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