झालावाड़

कर्मचारियों की कमी से कागजों में दब गई मृदा की ेसेहत

-सॉइल हैल्थ गड़बड़: 15 हजार सैंपल आए, जांच 5 हजार की ही हुई- 12000 का लक्ष्य, आधे कार्ड भी नहीं बना पाए  

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कर्मचारियों की कमी से कागजों में दब गई मृदा की ेसेहत

झालावाड़.जिले के किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच कर उसके स्वास्थ्य की जानकारी देने के लिए केन्द्र सरकार ने 8 साल पहले शुरू की गई योजना के तहत बड़ी संख्या में किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड बांटे जा चुके हैं। लेकिन उसका परिणाम नाममात्र का भी नहीं मिल पाया है। योजना की खामी व किसानों में जागरूकता की कमी के चलते मृदा की सेहत नहीं सुधर पा रही है। जिले में बिना मृदा परीक्षण के ही किसान अंधाधुंध रसायनों व उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे मिट्टी की सेहत दिनों दिन बिगड़ती जा रही है। लेकिन जिम्मेदार इसका उपचार नहीं कर पा रहे हैं। इसके चलते कई गंभीर बीमारियों के रूप में इसके परिणाम इंसानों में सामने आ रहे हैं।

12 हजार का लक्ष्य, आधा भी पूरा नहीं-
मृदा स्वास्थ्य कोर्ड सॉइल हैल्थ कार्ड योजना के तहत झालावाड़ जिले में कृषि विभाग ने इस वर्ष 12000 सॉइल हैल्थ कार्ड वितरण का लक्ष्य रखा था। लेकिन विभाग इनमें से मात्र 5871 नूमनों का ही विश्लेषण कर पाया है। जबकि किसानों ने मिट्टी प्रयोगशाला में15318 सैंपल जमा करवाए है।
लैब में मैनपावर की कमी है। ऐसे में12 हजार का उद्देश्य दूर-दूर तक पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। यदि यह कहा जाए कि मिट्टी परीक्षण की व्यवस्था ही पंगु है तो इसमें कोई ऐतराज नहीं होगा। क्योंकि यहां मिट्टी की सेहत जांचने वालों की भारी कमी है। जिला मुख्यालय पर मृदा परीक्षण लैब में 3 ही कर्मचारी है। लैब स्वयं बीमार नजर आ रही है।

उद्देश्य सही था, लागू नहीं कर पाए-
देशभर में किसान खेतों में अंधाधूंध रसायनों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे न केवल किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा है,बल्कि मृदा की सेहत भी खराब हो रही है। अधिक उपयोग से अनाज की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। इसका समाधान करने व उत्पादन बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार ने सॉइल हैल्थ कार्ड योजना लागू की थी, लेकिन जानकारी के अभाव में किसान आज भी हैल्थ कार्ड की रिपोर्ट जाने बिना ही उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे सरकार द्वारा योजना पर खर्च किए जा रहे करोड़ों रूपए मिट्टी में ही मिल रहे हैं। योजना को 19 फरवरी 2015 को प्रधानमंत्री ने राजस्थान के सूरतगढ़ से शुरू की थी।

किसान ले रुचि, तो मिले फायदा
सूत्रों ने बताया कि मृदा परीक्षण के लिए किसानों से मात्र 5 रूपए प्रति नमूना शुल्क लिया जाता है। किसानों की मिट्टी परीक्षण में रूचि नहीं है। ऐसे में खेतों में यूरिया व डीएपी की जरूरत नहीं होने पर भी अंधाधुंध उर्वरक किसान डाल रहे हैं। हालांकि किसानों ने इस बार कृषि विभाग के पास रिकॉर्ड 15 हजार से अधिक सैंपल जमा करवाए है, लेकिन विभाग में कर्मचारियों की कमी की वजह से अभी तक पूरे सैंपल की जांच भी नहीं हो पाई है।

जिन नूमनों की जांच हुई उनकी ऐसी आई रिपोर्ट:

-82 फीसदी सैंपल में आर्गेनिक कार्बन की कमी पाई गई
- 35 फीसदी सैंपल में जिंक की कमी पाई गई

- 45 फीसदी सैंपल में आयरन की कमी पाई गई
- किसान यूरिया व डीएपी पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, लेकिन अन्य न्यूर्टेन्ट की कमी है।
- जिले में किसान संतुलित उर्वरक नहीं दे रहे हैं, इससे पैदावार कम हो रही है।

फैक्ट फाइल-
- इस वर्ष का लक्ष्य-12000
- कुल सैंपल आए-15318
- विश्लेषित नमूने- 5871
-तैयार हैल्थ कार्ड- 3866
- वितरण किए गए है- 3866

मृदा प्रयोगशाला: स्कैन

ये पद भरे हुए
-प्रयोगशाला कृषि अनुसंधानअधिकारी- एक
- कनिष्ठ सहायक- एक
- सहायक -एक

ये पद लंबे समय से चल रहे खाली
-सहायक कृषि अनुसंधान अधिकारी-एक
- कनिष्ठ वैज्ञानिक सहायक- एक
- प्रयोगशाला सहायक- एक
- प्रयोगशाला उपष्ठक- 2
- वरिष्ठ सहायक-एक
- मैन पावर के साथ-साथ उपकरणों व आधुनिक मशीनों की कमी होने की वजह से भी समय पर किसानों की सॉइल की जांच नहीं हो पा रही।

परम्परागत खेती को अपनाना पड़ेगा-
मृदा में कुल 17 प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते हैं। इनमें 9 मुख्य पोषक तत्व तथा 8 सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं। इनपोषक तत्वों में से यदि एक की भी मृदा में कमी होती है तो फसल उत्पादन में विपरित प्रभाव पड़ता है। इसके लिए किसान मृदा की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए मृदा की जांच करवाकर ही फसलों में उर्वरक दें। किसा गौमूत्र,गोबर की खाद व जैविक दवाई बनाकर भी महंगी दवाई के खर्चे से बच सकते हैं।अभी रसायनयुक्त खेती करने की वजह से ही अभी कैंसर व पेट सहित कई बीमारियां हो रही है। किसानों को मेरी सलाह है कि परम्परागत खेती में शुरुआत में उत्पादन किसानों को कम लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे मृदा की सेहत सुधरने पर उत्पादन अच्छा होने लग जाएगा और इंसानों सहित जीव-जंतुओं को भी नुकसान नहीं होगा।
देवीलाल गुर्जर, जैविक किसान, धतुरिया।

अंधाधुंध डाल रहे -
जिले की खेती में जिंक, आयरन, कार्बन आदि की बहुत ज्यादा कमी पाई गई है। किसान यूरिया व डीएपी का अंधाधुुंध प्रयोग कर हैं। कई न्यूर्टेंट की कमी होने से मिट्टी की सेहत खराब होती जा रही है। समय रहते इसके उपचार की जरूरत है, संतुलित व जैविक उर्वरक का प्रयोग कर किसान कैंसर जैसी घातक बीमारियों से लोगों को बचा सकते हैं।आजकल सबसे ज्यादा खेती व इंसानों को नुकसान खरपतवारनाशक, कीटनाशक रसायनों के प्रयोग से हो रहा है। इनके प्रयोग से कृषि के जैविक गुण समाप्त हो रहे हैं। इससे मनुष्य के स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव पड़ रहा है। किसान यूरिया काखूब प्रयोग कर रहे है, उसी घास को जानवर खा रहे है उनके दूध के माध्यम से इंसानों तक उसकाअसर पहुंच रहा है। इससे कैंसर जैसे असाध्य रोग हो रहे हैं। मिट्टी की सेहत अच्छी रखने के लिए परम्परागत तरीके से खेती करें या संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें।
त्रिलोक चन्द शर्मा, कृषि अनुसंधान अधिकारी, रसायन, मृदा प्रयोगशाला, झालावाड़।

Published on:
28 Dec 2022 08:57 pm
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