झालावाड़ जिले में कई ग्रामीणों की आजीविका चलाता है तेंदुपत्ता
मौसम में नमी से संग्रहण भी कम, छेदक रोग से भी बढ़ा नुकसान
झालावाड़ जिले के भालता क्षेत्र में तेंदू के पत्तों में भीषण गर्मी व पतझड़ के मौसम में भी हरेभरे रहने की विशेषता होती है। इस वर्ष पत्ते फूटने के बाद से पकने तक भीषण गर्मी नहीं रही। ऊपर से गर्मी के सीजन में भी मई के अंत समय तक रुक रुक कर बारिश हो रही है। गर्मी के अभाव व वातावरण में नमी के चलते तेंदूपत्ते अच्छी तरह से नहीं पकने से लाल पड़ गए। पत्तों को पकने के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिलने से बीड़ी निर्माण के उचित पैमाने वाले पत्ते अपेक्षाकृत कम उत्पादन हुए।
महज 15 दिन खरीदी
अमूमन अप्रैल में तेंदूपत्ते फुटकर आकार लेने लग जाते हैं। पत्ता तुड़ाई व बिक्री से जुड़े लोग संग्रहण इकाइयों को बेचकर कमाई करते हैं। हर बार 20 अप्रैल से 10 जून तक काम जारी रहता है। इस वर्ष गर्मी गायब रहने से पेड़ों से पत्तों की फुटन में देरी से अधिकांश फड 10 मई से प्रारंभ हुए। मई के अंत में पत्तों की आवक लगभग खत्म हो गई। अब लोग अपने घरों की सारसंभाल व कृषि कार्य में जुट जाने से महज 15 दिन ही कार्य हुआ। ऐसे में पत्तों का उपार्जन कम हुआ।
खराब मौसम का असर
पिछले दिनों से मौसम में लगातार बदलाव हो रहा है। कभी तेज धूप, उमस, तो कभी अंधड़ व बारिश तो कभी मौसम का मिजाज ठंडा हो जाता है। बेमौसम बरसात व गर्मी के दिनों में भी ठंडक व नमी से तेंदूपत्ते खराब हो रहे हैं।
घाटे की नौबत
तेज गर्मी के बाद तेंदूपत्ते पकते हैं। अबकी बार 15 मई तक तुड़ाई का काम शुरू नहीं हुआ। खराब मौसम के कारण भी तेंदूपत्ते की क्वालिटी कमजोर हो गई। मौसम में नमी के चलते व माता रोग लगने से तेंदूपत्ता लाल, पीला व छेदक रोग युक्त रहने से बीड़ी बनाने लायक नहीं होता है। बीड़ी निर्माताओं द्वारा बड़े व पके हुए पत्तों की खरीदी की जाती है। ऐसे में बिगड़े मौसम से उत्पादन प्रभावित होने से मजदूरों व ठेकेदारों को घाटा लगने की नौबत आ रही है।
अंधड़ में उड़ गई पत्तों की गड्डियां
मई के आखिरी सप्ताह में आए दिन अंधड़ व तेज हवाएं चलने से तेंदूपत्ता व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। रविवार देर रात को तेज गति से हवाएं चलने के कारण खेतों में पड़ी तेंदूपत्ते की गड्डियां उड़ गई। ठेकेदार के कर्मचारियों ने मजदूरों की मदद से गड्डियों को उड़ने से बचाने के लिए एक जगह ढेर कर तिरपाल से ढंक दी।
इस सम्बंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए क्षेत्रीय वन अधिकारी बलराम गोचर को फोन किया, लेकिन उनके रिसीव नहीं करने के कारण बात नहीं हुई।